याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी संवाद: आत्म-ज्ञान की अमर कथा



प्राचीन भारत में, विदर्भ देश के राजा जनक के दरबार में याज्ञवल्क्य एक महान ऋषि के रूप में विख्यात थे, जिनका ज्ञान और तपस्या दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। उनकी दो पत्नियाँ थीं—कात्यायनी और मैत्रेयी। कात्यायनी सांसारिक सुखों और पारिवारिक जीवन में रुचि रखती थीं, जबकि मैत्रेयी एक गहन दार्शनिक और आत्मिक जिज्ञासु थीं, जिनका मन मोक्ष और आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर था। एक दिन, याज्ञवल्क्य ने वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने का निर्णय लिया, जो हिंदू जीवन के चतुर्थाश्रमों में से एक है, जहाँ व्यक्ति सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर तपस्या करता है। इस संन्यास की तैयारी में, उन्होंने अपनी संपत्ति का बंटवारा करने का विचार किया।

याज्ञवल्क्य ने कात्यायनी को उनकी समृद्धि का एक हिस्सा दिया, जो उनके सांसारिक जीवन के अनुरूप था। फिर वे मैत्रेयी के पास गए और कहा, "मैत्रेयि, मैं अपनी संपत्ति का आधा भाग तुम्हें दे रहा हूँ। तुम इसे लेकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो।" मैत्रेयी, जो सांसारिक वैभव से परे थीं, ने एक अप्रत्याशित प्रश्न पूछा, "भगवन्, यदि इस पृथ्वी का समस्त वैभव मुझे दे दिया जाए, तो क्या इससे मुझे अमरता प्राप्त हो सकेगी?" यह प्रश्न याज्ञवल्क्य को चकित कर गया, और उन्होंने उत्तर दिया, "नहीं, मैत्रेयि। संपत्ति से केवल भोग और क्षणिक सुख ही प्राप्त होते हैं, अमरता नहीं।"

संवाद का गहराई में विकास

मैत्रेयी की जिज्ञासा और बढ़ी। उन्होंने पूछा, "यदि संपत्ति से अमरता नहीं, तो मुझे वह किस काम की? हे भगवन्, मुझे उस ज्ञान की शिक्षा दीजिए, जो मुझे मोक्ष की ओर ले जाए और मेरी आत्मा को शाश्वत सत्य से जोड़े।" याज्ञवल्क्य प्रसन्न हुए, क्योंकि उन्हें एक सच्चा शिष्य मिला, जो ज्ञान की खोज में था। उन्होंने मैत्रेयी को अपने समीप बैठाया और कहा, "तुमने सही प्रश्न किया है, मैत्रेयि। अब मैं तुम्हें आत्मा का रहस्य बताऊंगा, जो सांसारिकता से परे है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।"

मूल श्लोक (बृहदारण्यक उपनिषद् 2.4.1)
स होवाच मैत्रेयि यदिदं भगवति संपत्तिर्यस्यां त्वमियं सर्वमादाय भुञ्जीथाः किमेनां त्वं भोगेनाप्नुयाः इति। स होवाच न वै तद्भोगेन संपत्तिरभिसंपद्यते मैत्रेयि।

(अनुवाद: याज्ञवल्क्य ने कहा, "मैत्रेयि, यदि यह समस्त संपत्ति तुम्हें दे दी जाए और तुम इसे भोगों, तो क्या इससे तुम संतुष्ट हो सकोगी?" मैत्रेयी ने कहा, "नहीं, संपत्ति से भोग तो मिल सकता है, परंतु संतुष्टि या अमरता नहीं।")

इसके बाद याज्ञवल्क्य ने समझाया कि सांसारिक समृद्धि का आकर्षण मायावी है। उन्होंने कहा, "जो कुछ प्रिय है—पति, पत्नी, पुत्र, धन—वह आत्मा के कारण प्रिय है, न कि आत्मा प्रिय के कारण। आत्मा ही सच्चा सुख और शाश्वत सत्य है।" उन्होंने मैत्रेयी को आत्मा और ब्रह्म की एकता का उपदेश दिया, जो सभी भेद—जाति, लिंग, और स्थिति—से परे है।

मूल श्लोक (बृहदारण्यक उपनिषद् 2.4.5)
न वा अरे पत्यु: कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे जायाया कामाय जाया प्रिया भवति, आत्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति।

(अनुवाद: हे मैत्रेयि, पति पति के लिए प्रिय नहीं होता, अपितु आत्मा के लिए प्रिय होता है। पत्नी पत्नी के लिए प्रिया नहीं होती, अपितु आत्मा के लिए प्रिया होती है।)

आत्मा का रहस्य और दार्शनिक गहराई

याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को आत्मा के स्वरूप को समझाया। उन्होंने कहा, "आत्मा ही दृष्टा है, श्रोता है, विचारक है और ज्ञाता है। जब तक मनुष्य अपने को शरीर और इंद्रियों से अलग नहीं समझता, तब तक वह अज्ञान में डूबा रहता है। आत्मा का साक्षात्कार ही मोक्ष का मार्ग है, जहाँ जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त होता है।" उन्होंने ब्रह्मांड की सृष्टि और विलय की प्रक्रिया को भी समझाया, जो आत्मा के साथ एकाकार है।

मूल श्लोक (बृहदारण्यक उपनिषद् 2.4.14)
स यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णाति च, एवं एव खलु इदं सर्वं ब्रह्मणा सृज्यते गृह्यते च।

(अनुवाद: जैसे मकड़ी अपने जाल को रचती है और फिर उसे ग्रहण करती है, वैसे ही यह समस्त ब्रह्मा द्वारा सृजित और ग्रहण किया जाता है।)

इस श्लोक के माध्यम से याज्ञवल्क्य ने बताया कि जैसे मकड़ी अपने जाल को अपने भीतर से उत्पन्न करती है, वैसे ही ब्रह्म ही इस सृष्टि का सर्जक और संहारक है, और आत्मा उस ब्रह्म का अंश है।

अंतिम संवाद और मोक्ष का मार्ग

कुछ समय बाद, याज्ञवल्क्य वन में तपस्या के लिए चले गए। मैत्रेयी, जो अब एक साध्वी के रूप में जीवन व्यतीत कर रही थीं, ने उनसे अंतिम बार मिलने की इच्छा जताई। याज्ञवल्क्य ने उन्हें फिर से आत्मा के सत्य का उपदेश दिया। उन्होंने कहा, "मृत्यु के बाद आत्मा शरीर से मुक्त होकर ब्रह्म में विलीन हो जाती है। जो इस सत्य को जान लेता है, वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।"

मूल श्लोक (बृहदारण्यक उपनिषद् 4.5.6)
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।

(अनुवाद: हे मैत्रेयि, आत्मा को देखना चाहिए, सुनना चाहिए, सोचना चाहिए और ध्यान करना चाहिए।)

मूल श्लोक (बृहदारण्यक उपनिषद् 4.5.15)
स यथा सुप्तः पुत्रलोकं गच्छति प्राजापत्यं वा, एवं ह वाव एष एतं लोकं प्राप्नोति यः संन्यासेनात्मानं विद्यादवृश्चिं।

(अनुवाद: जैसे कोई सोते हुए पुत्रलोक या प्राजापत्य लोक में जाता है, वैसे ही वह इस लोक को प्राप्त करता है, जो संन्यास के द्वारा आत्मा को जान लेता है और अविच्छिन्न रहता है।)

ये श्लोक मैत्रेयी को सिखाते हैं कि आत्मा का साक्षात्कार संन्यास और ध्यान के माध्यम से संभव है, जो उन्हें मोक्ष की ओर ले जाता है।

मैत्रेयी का जीवन और प्रभाव

मैत्रेयी ने इस ज्ञान को अपने जीवन में उतारा और आत्म-चिंतन के पथ पर अग्रसर हुईं। उनकी जिज्ञासा और याज्ञवल्क्य का उपदेश न केवल उनके लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बना। यह संवाद हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वह है जो आत्मा को मुक्त करे, न कि जो केवल सांसारिक सुख दे।

निष्कर्ष

याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद बृहदारण्यक उपनिषद् की एक अमर कथा है, जो हमें आत्म-ज्ञान और मोक्ष के महत्व को समझाती है। यह संवाद एक पति-पत्नी के बीच का प्रेम नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान का प्रतीक है। मैत्रेयी की जिज्ञासा और याज्ञवल्क्य का गहन उपदेश आज भी मानवता को आत्म-चिंतन, सत्य की खोज और शाश्वत शांति की ओर प्रेरित करते हैं। 2025 में, जब तकनीक और भौतिकवाद अपने चरम पर हैं, यह कथा हमें आत्मा के भीतर की शांति और सत्य की ओर लौटने का संदेश देती है।

भूखे पेट मिला ज्ञान: ऋषि उषस्ति चाक्रायण की अनसुनी कहानी जो बदल देगी आपकी सोच! |



जानें छांदोग्य उपनिषद की वो अद्भुत कथा जहाँ भूख ने एक महान ऋषि को दिया जीवन का सबसे बड़ा पाठ। कैसे एक महावत ने उषस्ति को सिखाया असली ज्ञान? पढ़ें और बदलें अपनी जीवन दृष्टि। 

उषस्ति चाक्रायण की अद्भुत कथा: जहाँ भूख ने ज्ञान का मार्ग दिखाया


प्राचीन भारत की पवित्र उपनिषद परंपरा, जहाँ गूढ़ ज्ञान और आध्यात्मिक सत्य को कहानियों के माध्यम से समझाया गया है, वहाँ एक ऐसी ही प्रेरणादायक कथा है ऋषि उषस्ति चाक्रायण की। यह कहानी छांदोग्य उपनिषद से ली गई है और हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान, कभी-कभी, सबसे अप्रत्याशित परिस्थितियों में मिलता है, और सबसे बड़ी विनम्रता में ही सबसे बड़ा गौरव छिपा होता है।

कल्पना कीजिए उस भयावह समय की। मगध देश में एक भयानक अकाल पड़ा था। गाँव-गाँव में लोग भूख और प्यास से दम तोड़ रहे थे। पानी का एक घूँट और अन्न का एक दाना भी सोने से महँगा हो गया था। ऐसे ही कठिन समय में, हमारे महाज्ञानी ऋषि उषस्ति चाक्रायण अपनी पत्नी के साथ दर-दर भटक रहे थे। वे वेदों के प्रकांड पंडित थे, लेकिन जब पेट में आग लगी हो, तो ज्ञान की बातें भी बेमानी लगने लगती हैं। शरीर सूख चुका था, और मन में बस एक ही विचार था – कैसे भी जीवित रहा जाए!

एक दिन, जब भूख असहनीय हो गई, तो ऋषि ने देखा कि एक महावत (हाथी हाँकने वाला) बैठकर उड़द खा रहा था। उस अकाल में, वह साधारण उड़द भी किसी अमृत से कम नहीं था। उषस्ति बिना किसी हिचकिचाहट के उस महावत के पास गए।

"महाशय," ऋषि ने अपनी पूरी विनम्रता से कहा, "क्या आप मुझे थोड़ा-सा उड़द दे सकते हैं? मैं बहुत भूखा हूँ, जान निकली जा रही है।"

महावत ने ऋषि को देखा। वह समझ गया कि ये कोई साधारण भिखारी नहीं हैं। उसने सम्मान से कहा, "गुरुदेव, ये उड़द जूठे हैं। मैंने इनमें से कुछ खा लिए हैं। बचा हुआ देना आपको शोभा नहीं देगा।"

क्या आप जानते हैं उषस्ति ने क्या जवाब दिया? उन्होंने कहा, "महाशय, इस समय जूठा होने की चिंता न करें। यदि मुझे यह भोजन नहीं मिलेगा, तो मेरे प्राण निकल जाएँगे। और यदि मैं ही जीवित नहीं रहा, तो मेरा सारा ज्ञान, मेरी सारी विद्या मेरे साथ ही खत्म हो जाएगी। इस समय प्राणों को बचाना ही सबसे बड़ा धर्म है।"

महावत ने ऋषि की बात समझी और बचे हुए उड़द उन्हें दे दिए। उषस्ति ने वह थोड़े से उड़द खाए, अपनी भूख शांत की और फिर पानी माँगा। महावत ने बताया कि उसका पानी भी जूठा है। उषस्ति ने वही बात दोहराई और पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। उन्होंने कुछ उड़द अपनी पत्नी के लिए भी बचाए, और बाकी अपने पास रख लिए।

अगले दिन, जब अकाल थोड़ा कम हुआ और कुछ भोजन की व्यवस्था हो सकी, तो उषस्ति की पत्नी ने उनके लिए भोजन बनाया। तब ऋषि को याद आया कि उनके पास अभी भी महावत के दिए हुए कुछ उड़द बचे हैं। उन्होंने सोचा, "उस व्यक्ति ने मेरे संकट में मेरी जान बचाई। अब जब मेरे पास भोजन है, तो मुझे उसे धन्यवाद देना चाहिए और उसे कुछ लौटाना चाहिए।"

वे महावत के पास गए और उसे बचे हुए उड़द वापस करने लगे। महावत हैरान था। "गुरुदेव," उसने पूछा, "अब जब आपके पास अपना भोजन है, तो आप ये जूठे उड़द मुझे क्यों लौटा रहे हैं?"

उषस्ति मुस्कुराए। "महाशय, कल मैंने ये उड़द अपने प्राण बचाने के लिए लिए थे। उस समय शुद्धि-अशुद्धि का विचार मेरे लिए मायने नहीं रखता था। लेकिन अब जब संकट टल गया है, तो मैं आपको उचित सम्मान देना चाहता हूँ। आप मेरे संकटमोचक थे।"


महावत से मिली वो सीख, जिसने बदला ऋषि का ज्ञान!


उषस्ति की कथा: आपके जीवन के लिए 3 बड़े संदेश
  1. प्राथमिकताएँ पहचानें: जीवन में क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण है? जब प्राणों पर संकट हो, तो सारे नियम और मर्यादाएँ गौण हो जाती हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन में अपनी वास्तविक प्राथमिकताओं को पहचानना कितना ज़रूरी है।
  1. ज्ञान का स्रोत: सच्चा ज्ञान केवल बड़ी-बड़ी किताबों या यूनिवर्सिटी की डिग्री में नहीं होता। यह जीवन के अनुभवों में, आपकी विनम्रता में, और कभी-कभी उन लोगों में भी छिपा होता है जिन्हें हम साधारण समझते हैं। ज्ञान कहीं से भी, किसी से भी मिल सकता है, बस आँखें खुली रखिए!
  1. कृतज्ञता और विनम्रता: जिसने संकट में आपकी मदद की, उसे कभी न भूलें। कृतज्ञता व्यक्त करना और विनम्र बने रहना ही सच्चे ज्ञानी का लक्षण है। उषस्ति की तरह, कभी अपने अहंकार को अपने ज्ञान से बड़ा न होने दें।

यह कहानी सिर्फ़ एक भूखे व्यक्ति को भोजन मिलने की नहीं है। इसके पीछे एक गहरा रहस्य छिपा है।

उषस्ति चाक्रायण इतने ज्ञानी थे कि एक बार उन्हें एक बड़े यज्ञ में ऋत्विक (यज्ञ कराने वाले मुख्य पंडित) के रूप में बुलाया गया। जब वे यज्ञ में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि अन्य ऋत्विक नियम-पूर्वक स्तुति गा रहे थे, लेकिन उन्हें शायद उसके वास्तविक अर्थ का ज्ञान नहीं था। उषस्ति ने साहस कर उनसे पूछा, "आप जो यह स्तुति गा रहे हैं, क्या आप उस देवता के विषय में जानते हैं जिसकी आप स्तुति कर रहे हैं? यदि नहीं जानते, तो आपकी यह स्तुति व्यर्थ है!"

सारे ऋत्विक शर्मिंदा हो गए। वे केवल नियमों का पालन कर रहे थे, लेकिन उसके पीछे की आत्मा को नहीं समझते थे। तब उषस्ति ने उन्हें समझाया कि सच्ची स्तुति तब होती है जब आप उस देवता के वास्तविक स्वरूप को समझते हैं। उन्होंने 'प्राण' को 'उद्गीथ' (श्रेष्ठ गान) के रूप में समझाया और कहा कि प्राण ही सभी देवताओं का आधार है।

अब आप सोच रहे होंगे, यह ज्ञान उन्हें कहाँ से मिला? क्या यह उन्होंने किसी ग्रंथ से सीखा? नहीं! यह ज्ञान उन्हें उसी साधारण महावत से मिला था, जिससे उन्होंने भूख में उड़द लिए थे!

महावत ने भले ही कोई उपदेश न दिया हो, लेकिन उसकी निःस्वार्थ दयालुता, उस संकट में भी दूसरों की मदद करने की उसकी भावना, और उस पल में उषस्ति द्वारा अनुभव की गई 'प्राण' की महत्ता – इन सबने मिलकर उषस्ति के गूढ़ सैद्धांतिक ज्ञान में जीवन का एक व्यावहारिक सत्य जोड़ दिया था। उन्होंने महसूस किया कि प्राणों की रक्षा का सर्वोच्च धर्म है, और यह सीख उन्हें एक साधारण व्यक्ति से मिले जीवन के अनुभव से मिली थी।

यह अद्भुत कथा हमें आज भी कई अनमोल बातें सिखाती है:

उषस्ति चाक्रायण की कहानी हमें याद दिलाती है कि जीवन के सबसे कठिन क्षण ही हमें सबसे मूल्यवान सबक देते हैं, और ज्ञान अक्सर उन जगहों से आता है जहाँ हम उसकी कल्पना भी नहीं करते।

उद्दालक और श्वेतकेतु की कथा एवं "तत् त्वम् असि" (छांदोग्य उपनिषद्)


                         

भूमिका: छांदोग्य उपनिषद् की प्रसिद्ध कथा – महर्षि उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु का संवाद – केवल एक पारंपरिक उपदेश नहीं, बल्कि आत्मबोध और अद्वैत वेदांत दर्शन का मूल आधार है। इस संवाद में प्रतिपादित महावाक्य "तत् त्वम् असि" (तू वही है) समस्त वेदांत का सार है, जो यह उद्घोष करता है कि आत्मा और ब्रह्म अलग नहीं, एक ही हैं।

छांदोग्य उपनिषद् (६.१-१६) में महर्षि उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु का संवाद आत्मज्ञान के सर्वोच्च सत्य को प्रकट करता है। यहीं पर प्रसिद्ध "तत् त्वम् असि" (तू वही है) महावाक्य प्रतिपादित होता है, जो अद्वैत वेदांत दर्शन का मूल आधार है।

विस्तृत कथा एवं शिक्षा

1. श्वेतकेतु का अहंकार और पिता का प्रश्न

कथा प्रारंभ होती है जब श्वेतकेतु १२ वर्ष की आयु में वेदाध्ययन हेतु गुरुकुल जाता है और २४ वर्ष तक शास्त्रों का अध्ययन करके लौटता है। वह स्वयं को पूर्ण ज्ञानी समझने लगता है। उसके अहंकार को देखकर उद्दालक पूछते हैं:

"किं त्वया तदनन्विष्टं येन श्रुतं श्रुतं भवति, अमतं मतं, अविज्ञातं विज्ञातम्?"
(छांदोग्य उपनिषद् ६.१.३)
"क्या तुमने उस सत्य को नहीं जाना, जिसे जान लेने पर अनसुना सुना हो जाता है, अदेखा देखा हो जाता है और अज्ञात ज्ञात हो जाता है?"

श्वेतकेतु आश्चर्यचकित होकर कहता है: "वह क्या है?"
तब उद्दालक उसे ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं।

2. उपदेश की श्रृंखला: सृष्टि का एकत्व

उद्दालक ने नौ उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि समस्त जगत की उत्पत्ति एक ही सत्ता (ब्रह्म) से हुई है:

(क) मृत्तिका-न्याय (मिट्टी का उदाहरण)

"यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्..."
(छांदोग्य ६.१.४)
"हे प्रिय! जैसे एक मिट्टी के ढेले को जान लेने पर सारी मिट्टी की वस्तुएँ जान ली जाती हैं... वैसे ही एक तत्व (ब्रह्म) को जानकर सब कुछ जान लिया जाता है।"

(ख) वृक्ष-न्याय (वृक्ष का उदाहरण)

"यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्यात्..."
(छांदोग्य ६.१.५)
जैसे लोहे की एक अणुक को जानकर सारा लोहा जान लिया जाता है, वैसे ही ब्रह्म को जानकर सब कुछ जान लिया जाता है।

इसी प्रकार आग, जल, फल, नमक आदि के उदाहरण देकर उद्दालक ने समझाया कि विविधता में एकता ही सत्य है।

3. "तत् त्वम् असि" (तू वही है) का रहस्य

अंत में, उद्दालक ने श्वेतकेतु को तीन बार समझाया:

"तत् त्वम् असि, श्वेतकेतो!"
(छांदोग्य ६.८.७, ६.९.४, ६.१४.३)
"हे श्वेतकेतु! तू वही (ब्रह्म) है।"

इस महावाक्य का अर्थ:

  1. तत् (वह) → परब्रह्म (सर्वव्यापक सच्चिदानंद)।

  2. त्वम् (तू) → जीवात्मा (तुम्हारा वास्तविक स्वरूप)।

  3. असि (है) → दोनों एक ही हैं, भेद केवल भ्रम है।

यह अद्वैत (अ-द्वैत = दो नहीं) का सिद्धांत है, जो कहता है कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। जैसे:

  • नदी और समुद्र अलग दिखते हैं, पर दोनों जल ही हैं।

  • सोने के विभिन्न आभूषण अलग दिखते हैं, पर सब सोना ही हैं।

4. श्वेतकेतु की ज्ञानप्राप्ति

इस उपदेश के बाद श्वेतकेतु का अहंकार नष्ट होता है और उसे आत्मसाक्षात्कार होता है। वह समझ जाता है कि:

  • वह स्वयं ब्रह्म है (अहं ब्रह्मास्मि)।

  • संपूर्ण सृष्टि ब्रह्ममय है (सर्वं खल्विदं ब्रह्म)।

"तत् त्वम् असि" की दार्शनिक व्याख्या

यह महावाक्य वेदांत दर्शन के चार प्रमुख महावाक्यों में से एक है। इसकी तीन स्तरों पर व्याख्या होती है:

(१) व्यावहारिक स्तर (जीव-ईश्वर भेद)

  • तत् = ईश्वर (सगुण ब्रह्म), त्वम् = जीवात्मा।

  • अर्थ: "तुम्हारा अस्तित्व ईश्वर से ही है।"

(२) उपासना स्तर (एकत्व का बोध)

  • तत् और त्वम् एक ही तत्व के दो नाम हैं।

  • जैसे: "आकाश" और "घटाकाश" वास्तव में एक ही हैं।

(३) पारमार्थिक स्तर (शुद्ध अद्वैत)

  • कोई भेद ही नहीं, न जीव, न ईश्वर, केवल ब्रह्म ही सत्य है।

  • "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) इसी की घोषणा है।

कथा का सारांश एवं शिक्षा

  1. अहंकार का त्याग: शास्त्रीय ज्ञान से बड़ा आत्मज्ञान है।

  2. एकत्व का दर्शन: विविधता के पीछे एक ब्रह्म ही सत्य है।

  3. "तत् त्वम् असि" का सन्देश:

    • तुम्हारा वास्तविक स्वरूप शुद्ध चैतन्य (ब्रह्म) है।

    • शरीर, मन और नाम-रूप माया हैं, वास्तविक नहीं।

"यह आत्मा ब्रह्म है" (अयमात्मा ब्रह्म) – माण्डूक्य उपनिषद्
"मैं ही ब्रह्म हूँ" (अहं ब्रह्मास्मि) – बृहदारण्यक उपनिषद्

इस प्रकार, यह कथा वेदांत के अद्वैत सिद्धांत की मूलभूत शिक्षा देती है कि समस्त सृष्टि और जीव ब्रह्म के अंश नहीं, बल्कि स्वयं ब्रह्म ही हैं

निष्कर्ष: "तत् त्वम् असि" केवल एक वाक्य नहीं, आत्मजागरण का मंत्र है। यह श्वेतकेतु की तरह हमें भी आमंत्रण देता है – अपनी आत्मा को पहचानो, ब्रह्म से एक हो जाओ, और जीवन के परम सत्य को अनुभव करो। यही अद्वैत वेदांत की आत्मा है – और यही सनातन सत्य।

श्वेतकेतु की कहानी: आत्मा और ब्रह्म की एकता का पाठ



श्वेतकेतु की कहानी: आत्मा और ब्रह्म की एकता का पाठ

 श्वेतकेतु एक बुद्धिमान और प्रतिभाशाली बालक थे, जो अपने पिता उद्दालक ऋषि के आश्रम में पले-बढ़े। जब वे 12 वर्ष के हुए, उनके पिता ने उन्हें वेदों और शास्त्रों का ज्ञान देने के लिए गुरु हरिद्रुमत गौतम के पास भेजा। श्वेतकेतु ने 12 वर्षों तक कठोर परिश्रम से शिक्षा ग्रहण की और वेदों के कई श्लोकों को कंठस्थ कर लिया। अपने ज्ञान से अभिमानित होकर, वे अपने गाँव लौटे और अपने पिता के सामने अपने विद्वता का प्रदर्शन करने लगे।

उद्दालक ऋषि ने अपने पुत्र की इस अहंकारपूर्ण मुद्रा को देखा और समझ गए कि श्वेतकेतु का ज्ञान सतही है। उन्होंने श्वेतकेतु से पूछा, "क्या तुमने वह ज्ञान प्राप्त किया है जो सुनने में ही सब कुछ समझा दे, जिसे जानकर अज्ञानी ज्ञानी बन जाए, और जो इस विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का रहस्य बताए?" श्वेतकेतु ने जवाब दिया, "नहीं, मेरे गुरु ने मुझे ऐसा कोई ज्ञान नहीं सिखाया।" यह सुनकर उद्दालक ऋषि ने अपने पुत्र को आत्मा और ब्रह्म के सत्य का उपदेश देना शुरू किया।

उद्दालक ऋषि ने श्वेतकेतु को प्रकृति के उदाहरणों के माध्यम से सिखाना शुरू किया। उन्होंने कहा, "जैसे मधु के छत्ते में से शहद इकट्ठा किया जाता है, और सभी फूलों का रस एक होकर शहद बनता है, वैसे ही इस विश्व की आत्मा एक है।" फिर उन्होंने एक अंजीर के बीज को तोड़कर दिखाया और पूछा, "इसमें क्या दिखाई देता है?" श्वेतकेतु ने कहा, "कुछ नहीं।" ऋषि ने कहा, "फिर भी इस सूक्ष्म तत्व से यह विशाल वृक्ष उत्पन्न होता है। इसी तरह, इस विश्व का सूक्ष्म आधार ब्रह्म है, जो सबमें व्याप्त है।"

इसके बाद उद्दालक ने पानी, आग, और भोजन के उदाहरण दिए। उन्होंने श्वेतकेतु से कहा, "जब कोई व्यक्ति पानी पीता है, तो वह उसके रक्त और प्राण में परिवर्तित हो जाता है। जब वह भोजन खाता है, तो वह उसके मांस और शक्ति बन जाता है। ये सब एक ही स्रोत से उत्पन्न होते हैं—ब्रह्म।" इन उदाहरणों के माध्यम से ऋषि ने बार-बार "तत् त्वम् असि" का उपदेश दिया, जिसका अर्थ है कि "तू वह है," यानी श्वेतकेतु की आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं।

श्वेतकेतु को शुरू में यह समझना मुश्किल लगा, लेकिन अपने पिता के धैर्यवान और बार-बार दोहराए गए उपदेशों से, उन्होंने धीरे-धीरे इस सत्य को ग्रहण किया। इस कथा के अंत में श्वेतकेतु को अपने अहंकार से मुक्ति मिली, और वे आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर हुए।

"तत् त्वम् असि" का विवेचन

"तत् त्वम् असि" छांदोग्य उपनिषद् (6.8.7) में उद्दालक ऋषि द्वारा श्वेतकेतु को दिया गया एक महान वाक्य है, जो अद्वैत वेदांत के दर्शन का आधार है। इसका शाब्दिक अर्थ है "तू वह है," लेकिन इसका गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है। इसे विस्तार से समझें:

  • शब्दों का अर्थ:
    • तत् (That) ब्रह्म को संदर्भित करता है—सर्वव्यापी, अनंत, और निर्विकार सत्य।
    • त्वम् (Thou) व्यक्तिगत आत्मा (आत्मन्) को दर्शाता है, जो प्रत्येक जीव में निवास करता है।
    • असि (Art) इन दोनों के बीच अभेद को स्थापित करता है, एकता का सूचक है।
  • दार्शनिक अर्थ:
    यह वाक्य सिखाता है कि आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। जो सत्य ब्रह्म में है—अमरता, शांति, और ज्ञान—वही आत्मा में भी विद्यमान है। भौतिक शरीर, मन, और इंद्रियों के कारण यह एकता छिपी रहती है, लेकिन आत्म-चिंतन और ज्ञान के माध्यम से यह सत्य प्रकट होता है। यह अद्वैतवाद (non-dualism) का मूल सिद्धांत है, जिसे आदि शंकराचार्य ने बाद में विस्तार से समझाया।
  • आध्यात्मिक प्रभाव:
    "तत् त्वम् असि" एक आत्म-प्रबोधन का सूत्र है। यह हमें सिखाता है कि बाहरी सुखों या सामाजिक पहचान की खोज छोड़कर भीतर की ओर देखना चाहिए। जब कोई इस सत्य को अनुभव करता है, तो मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त होती है, जहाँ आत्मा अपने मूल स्वरूप—ब्रह्म—के साथ एक हो जाती है।
  • उदाहरण के माध्यम से समझ:
    उद्दालक ने श्वेतकेतु को प्रकृति के उदाहरण दिए, जैसे कि नदी का पानी समुद्र में मिलकर एक हो जाता है। इसी तरह, व्यक्तिगत आत्मा (जिवात्मा) ब्रह्म (परमात्मा) में विलीन हो जाती है, फिर भी उसकी पहचान बनी रहती है। यह एकता और भेद का समन्वय है, जो वैष्णव दर्शन में भी प्रतिबिंबित होता है।

आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व

श्वेतकेतु की कहानी हमें आत्म-ज्ञान की शक्ति और गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को सिखाती है। यह दर्शाती है कि वास्तविक शिक्षा वह है जो अहंकार को तोड़कर आत्मा की एकता को स्थापित करे। "तत् त्वम् असि" का मंत्र आज भी ध्यान और योग में प्रयोग होता है, जो हमें अपने भीतर के दिव्य स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है। यह कथा भारतीय संस्कृति में आत्म-चिंतन और समन्वय का प्रतीक है।

निष्कर्ष

श्वेतकेतु की कहानी हमें आत्मा और ब्रह्म की एकता की ओर ले जाती है, जहाँ "तत् त्वम् असि" एक मार्गदर्शक मंत्र बन जाता है। यह हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान बाहरी विद्वता से नहीं, बल्कि भीतरी चेतना की खोज से प्राप्त होता है। आइए, इस कथा से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में आत्म-विकास और आध्यात्मिक उन्नति की ओर कदम बढ़ाएँ। अधिक ज्ञान के लिए अनंत बोध पर जुड़ें।

देव और असुरों के द्वारा आत्मा की खोज

 


देव और असुरों के द्वारा आत्मा की खोज

परिचय

उपनिषद् प्राचीन भारत की आध्यात्मिक और दार्शनिक रचनाएँ हैं, जो जीवन, आत्मा, और ब्रह्म की गहरी खोज पर केंद्रित हैं। छांदोग्य उपनिषद् की यह कथा देवताओं के राजा इंद्र और असुरों के नेता विरोचन की आत्मा की खोज की यात्रा को दर्शाती है। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान सतह से परे गहरी समझ और गुरु के मार्गदर्शन से प्राप्त होता है, न कि केवल बाहरी रूप को देखकर। यह कथा आत्मा की अमरता और ब्रह्म के साथ उसके एकत्व को रेखांकित करती है, जो हिंदू दर्शन का मूल सिद्धांत है।

कथा की पृष्ठभूमि

प्राचीन काल में, जब देवता और असुर दोनों ही आत्मा (आत्मन्) के सत्य को जानने के लिए उत्सुक थे, तब देवताओं के राजा इंद्र और असुरों के नेता विरोचन ने सृष्टि के रचयिता प्रजापति (ब्रह्मा) से ज्ञान प्राप्त करने का निश्चय किया। दोनों ने अपने हाथों में बलि की सामग्री (सामिद्) लेकर शिष्यों की भाँति प्रजापति के पास जाने का निर्णय लिया। यह प्रतीकात्मक रूप से उनकी नम्रता और ज्ञान की खोज में समर्पण को दर्शाता है।

प्रजापति ने जब उन्हें देखा, तो पूछा, "प्रिय मित्रों, आप यहाँ किस उद्देश्य से आए हैं?" दोनों ने एक स्वर में उत्तर दिया, "महान गुरु, हम आपके मुख से आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आए हैं।" प्रजापति ने उनकी भक्ति और उत्साह को देखकर उन्हें अपने पास 32 वर्षों तक रहने और ब्रह्मचर्य का कठोर पालन करने का निर्देश दिया। इंद्र और विरोचन ने इस कठिन अवधि को स्वीकार किया और गुरु की सेवा में समय बिताया।

प्रजापति का प्रथम उपदेश

32 वर्षों के बाद, प्रजापति ने दोनों को बुलाया और कहा, "यह जो व्यक्ति आँख की पुतली में दिखाई देता है, वही आत्मा है। यह आत्मा अमर है, निर्भय है, और यही ब्रह्म है। जब तुम पानी या दर्पण में देखते हो, तो यही आत्मा दिखाई देती है। जाओ, दोनों में देखो और मुझे बताओ कि तुमने क्या देखा। यदि तुम्हें तब भी आत्मा का ज्ञान न हो, तो मुझे सूचित करना।"

इंद्र और विरोचन ने अगले दिन पानी और दर्पण में अपनी छवि देखी। प्रजापति ने पूछा, "मित्रों, तुमने क्या देखा?" दोनों ने उत्तर दिया, "गुरुदेव, हमने अपने पूरे शरीर को देखा—सिर से पैर तक, हमारी सटीक प्रतिलिपि।" प्रजापति ने फिर कहा, "अब अपने शरीर को साफ करो, अच्छे वस्त्र और आभूषण पहनो, और फिर से पानी या दर्पण में देखकर अपनी अनुभूति बताओ।"

अगली सुबह, दोनों ने स्वयं को साफ-सुथरा किया, सुंदर वस्त्र और आभूषण पहने, और पानी में अपनी छवि देखी। उन्होंने प्रजापति से कहा, "हमने स्वयं को साफ-सुथरा, अच्छे वस्त्रों में, और आभूषणों से सुसज्जित देखा।" प्रजापति ने कहा, "यही आत्मा है, जो निर्भय और अमर है। यही ब्रह्म है।"

इंद्र और विरोचन की प्रतिक्रिया

प्रजापति के इस उत्तर से दोनों संतुष्ट प्रतीत हुए और अपने-अपने मार्ग पर लौट गए। लेकिन प्रजापति ने उन्हें जाते हुए देखकर मन ही मन कहा, "बिना वास्तविक आत्मा को जाने, बिना सच्चे ज्ञान के वे चले गए। चाहे वे देव हों या असुर, यदि वे वास्तविकता की मात्र छाया से संतुष्ट हैं, तो उनका पतन निश्चित है।"

विरोचन आत्मसंतुष्ट होकर असुरों के पास लौटा और उसने इस ज्ञान को साझा किया। उसने इसे अंतिम सत्य मान लिया और असुरों से कहा, "इस शरीर को ही आत्मा मानकर इसकी महिमा करो। इस शरीर की सेवा करो। इसकी महिमा और सेवा से हम इस लोक और परलोक दोनों को प्राप्त कर सकते हैं।" आज भी असुरों में सच्चे आत्मा का ज्ञान नहीं है। वे इस शरीर को ही आत्मा मानते हैं, इसे सजाते हैं, और विश्वास करते हैं कि यही सत्य है। वे कम विश्वास वाले होते हैं, न तो विश्वास के साथ दान करते हैं और न ही यज्ञ करते हैं।

इंद्र की गहरी खोज

दूसरी ओर, इंद्र अपनी राह पर चलते हुए रुके और गहरे चिंतन में डूब गए। उन्होंने सोचा, "जो सजाया गया शरीर पानी या दर्पण में दिखता है, वह आत्मा कैसे हो सकता है? यदि शरीर सजा हुआ है, तो प्रतिबिंब सजा हुआ दिखता है। यदि शरीर गंदा है, तो प्रतिबिंब गंदा दिखता है। यदि शरीर अंधा है, तो प्रतिबिंब भी अंधा दिखेगा। और जब शरीर मर जाता है, तो यह जल जाता है या सड़ जाता है—यह चेतन नहीं रहता। फिर यह अचेतन कैसे आत्मा हो सकता है, जिसे सदा प्रकाशमान और चेतन कहा गया है?"

इंद्र ने अपने संदेहों को स्पष्ट करने के लिए प्रजापति के पास वापस जाने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी शंकाएँ प्रजापति के सामने रखीं। इस बार प्रजापति अधिक दयालु थे और उन्होंने इंद्र को केवल पाँच वर्ष और अपने पास रहने को कहा। इस प्रकार, इंद्र को कुल मिलाकर 100 वर्षों से अधिक समय तक गुरु के पास रहना पड़ा।

सच्चा ज्ञान

पाँच वर्षों के बाद, प्रजापति ने इंद्र को बुलाया और कहा, "हे इंद्र, तुमने अपनी निरंतर खोज, दृढ़ संकल्प, और गहरी जिज्ञासा के द्वारा उच्चतम सत्य के ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकार अर्जित किया है। यह शरीर नश्वर है, यह मृत्यु के अधीन है। जब समय आता है, तो यह नष्ट हो जाता है। यह अमर और अशरीरी आत्मा का नश्वर आवास है। जब तक आत्मा इस शरीर में रहती है और इससे जुड़ी रहती है, तब तक वह सुख-दुख, अच्छे-बुरे, और इच्छित-अनिच्छित से प्रभावित प्रतीत होती है। लेकिन मूल रूप से यह अशरीरी आत्मा सभी द्वंद्वों से परे है।

जैसे हवा, बादल, और बिजली आकाश में कुछ समय के लिए रूप और आकार लेते हैं, फिर अपने कार्य और समय के बाद लुप्त हो जाते हैं, वैसे ही शरीर भी रूप और आकार लेते हैं और फिर नष्ट हो जाते हैं, लेकिन वे आत्मा के अस्थायी आवास हैं। जब तक आत्मा इन शरीरों में रहती है और उनसे जुड़ी रहती है, तब तक वह सीमित और बंधन में प्रतीत होती है। लेकिन जब वह शरीर से मुक्त हो जाती है, तो वह अनंत आत्मा के साथ एक हो जाती है। जब आत्मा शरीर छोड़ती है, तो वह अनंत लोकों में स्वतंत्र रूप से विचरण करती है। आँख, कान, इंद्रियाँ, और मन केवल इसलिए हैं ताकि आत्मा देख सके, सुन सके, और सोच सके। यह आत्मा के कारण और आत्मा में ही है कि सभी चीजें और प्राणी अस्तित्व में हैं। वही सत्य है और सभी अस्तित्व का अंतिम आधार है।"

कथा का प्रभाव

इंद्र ने यह ज्ञान देवताओं को साझा किया, और इसी ज्ञान के कारण वे अपनी देवता की स्थिति को प्राप्त करते हैं। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान सतही समझ से नहीं, बल्कि गहरी खोज, संदेह के समाधान, और गुरु की शरण से प्राप्त होता है। विरोचन की तरह जो भौतिक शरीर को ही आत्मा मान लेते हैं, वे सत्य से दूर रहते हैं, जबकि इंद्र की तरह जो सत्य की खोज में अथक प्रयास करते हैं, उन्हें आत्मा और ब्रह्म का सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक महत्व

यह कथा उपनिषदों के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करती है: आत्मा और ब्रह्म का एकत्व। यह हमें सिखाती है कि आत्मा शरीर से परे है, वह अमर, निर्भय, और अनंत है। भौतिक संसार की सजावट और सुख-सुविधाएँ मायावी हैं, और सच्चा सुख आत्मा की खोज में है। यह कथा भक्ति, जिज्ञासा, और गुरु के प्रति समर्पण के महत्व को भी दर्शाती है।

निष्कर्ष

छांदोग्य उपनिषद् की यह कथा हमें आत्मा की सच्ची प्रकृति की ओर ले जाती है और सिखाती है कि सत्य की खोज में धैर्य, संदेह का समाधान, और गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। यह हमें प्रेरित करती है कि हम अपने जीवन में भी सतही सुखों से परे जाकर आत्मा और ब्रह्म की एकता को समझें। आइए, इस कथा से प्रेरणा लेकर हम भी अपनी आध्यात्मिक यात्रा को समृद्ध करें और सच्चे ज्ञान की खोज में आगे बढ़ें।

  • कथा का स्रोत: यह कथा छांदोग्य उपनिषद् से ली गई है, जो आत्मा (आत्मन्) और ब्रह्म की खोज पर केंद्रित है।
  • मुख्य पात्र: इंद्र (देवताओं का राजा), विरोचन (असुरों का नेता), और प्रजापति (ब्रह्मा, सृष्टि के रचयिता)।
  • महत्व: यह कथा आत्मा की सच्ची प्रकृति और भौतिक शरीर से परे सत्य की खोज का प्रतीक है।
  • आध्यात्मिक संदेश: सच्चा ज्ञान निरंतर खोज, संदेह, और गुरु की शरण से प्राप्त होता है।

नचिकेता और यमराज की कथा: आत्मज्ञान की खोज



नचिकेता और यमराज की कथा: आत्मज्ञान की खोज

उपनिषदों में छुपी कथाएँ हमें जीवन के गहरे सत्यों से जोड़ती हैं। ऐसी ही एक प्रेरक कथा है नचिकेता और यमराज की, जो कठोपनिषद् में वर्णित है। यह कथा न केवल आध्यात्मिक जिज्ञासा को जगाती है, बल्कि हमें आत्मज्ञान और मृत्यु के रहस्य को समझने का मार्ग भी दिखाती है। आइए, इस कथा को जानें और इसके गहरे संदेश को अपने जीवन में उतारें।

कथा का प्रारंभ: नचिकेता का साहस

प्राचीन काल में एक ब्राह्मण ऋषि थे, जिनका नाम था वाजश्रवा। वे एक यज्ञ कर रहे थे, जिसमें उन्होंने अपनी सारी संपत्ति दान करने का संकल्प लिया। वाजश्रवा का एक पुत्र था, नचिकेता, जो बहुत जिज्ञासु और साहसी था। यज्ञ के दौरान, वाजश्रवा ने अपनी बूढ़ी और बेकार गायों को दान में दे दिया, जो वास्तव में किसी काम की नहीं थीं। यह देखकर नचिकेता को लगा कि यह दान सच्चे हृदय से नहीं किया गया।

नचिकेता ने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, आपने सब कुछ दान दे दिया, लेकिन मुझे किसे दान करेंगे?" इस प्रश्न से वाजश्रवा क्रोधित हो गए और गुस्से में बोल पड़े, "मैं तुझे यमराज को दान करता हूँ!" नचिकेता ने इसे गंभीरता से लिया और सोचा कि यदि पिता ने ऐसा कहा है, तो उसे यमराज के पास जाना चाहिए। उसने बिना डरे यमलोक की यात्रा शुरू कर दी।

यमलोक में नचिकेता की प्रतीक्षा

नचिकेता जब यमलोक पहुँचा, तो यमराज वहाँ उपस्थित नहीं थे। वे तीन दिन तक बाहर थे। नचिकेता ने यमलोक के द्वार पर तीन दिन और तीन रात बिना भोजन, पानी या विश्राम के प्रतीक्षा की। जब यमराज लौटे, तो उन्हें पता चला कि एक ब्राह्मण बालक उनके द्वार पर इतने समय से प्रतीक्षा कर रहा है। अतिथि सत्कार के नियम के अनुसार, यमराज को अपनी अनुपस्थिति के लिए क्षमा माँगनी पड़ी।

यमराज ने नचिकेता से कहा, "हे बालक, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा के कारण अपराधी हूँ। तुमने तीन दिन और तीन रात यहाँ प्रतीक्षा की, इसलिए मैं तुम्हें तीन वरदान देता हूँ। जो भी चाहो, माँग लो।"

नचिकेता के तीन वरदान

नचिकेता ने अपनी बुद्धिमत्ता और गहरे विचारों का परिचय देते हुए तीन वरदान माँगे।

पहला वरदान: पिता की शांति

नचिकेता ने कहा, "मेरे पिता वाजश्रवा मुझसे क्रोधित थे। मेरा पहला वरदान यह है कि जब मैं लौटूँ, तो उनके हृदय में मेरे प्रति क्रोध न रहे और वे मुझे प्रेम से स्वीकार करें।" यमराज ने मुस्कुराकर यह वरदान दे दिया और कहा, "ऐसा ही होगा।"

दूसरा वरदान: अग्नि विद्या का ज्ञान

नचिकेता ने दूसरा वरदान माँगा, "मुझे वह अग्नि विद्या सिखाइए, जो स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग दिखाती है और जिसके द्वारा मनुष्य सभी सांसारिक दुखों से मुक्त हो जाता है।" यमराज ने उसे अग्नि विद्या का ज्ञान दिया, जो यज्ञ और कर्मकांड के माध्यम से मन को शुद्ध करने और स्वर्ग प्राप्त करने का मार्ग था। इस विद्या को नचिकेता ने पूरी तरह आत्मसात कर लिया।

तीसरा वरदान: आत्मा और मृत्यु का रहस्य

तीसरे वरदान के लिए नचिकेता ने सबसे गहरा प्रश्न पूछा, "हे यमराज, कुछ लोग कहते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा जीवित रहती है, और कुछ कहते हैं कि वह नहीं रहती। मुझे यह सत्य बताइए कि मृत्यु के बाद क्या होता है?" यमराज इस प्रश्न से हिचकिचाए। उन्होंने कहा, "यह प्रश्न बहुत कठिन है। इसे देवता भी पूरी तरह नहीं समझ पाए। तुम कुछ और माँग लो—धन, वैभव, लंबी आयु, स्वर्ग के सुख।"

लेकिन नचिकेता अडिग रहा। उसने कहा, "ये सांसारिक सुख क्षणिक हैं। मुझे केवल आत्मज्ञान चाहिए।" नचिकेता की दृढ़ता से प्रभावित होकर, यमराज ने उसे आत्मा का रहस्य समझाया।

यमराज का आत्मज्ञान

यमराज ने नचिकेता को बताया, "आत्मा न जन्मती है, न मरती है। वह अनादि और अनंत है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। जो लोग शरीर को ही सत्य मानते हैं, वे मृत्यु से डरते हैं, लेकिन जो आत्मा को जान लेते हैं, वे मृत्यु से परे चले जाते हैं।"

यमराज ने आगे समझाया, "आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधक को सांसारिक सुखों का त्याग करना होगा। उसे अपने मन को शुद्ध करना होगा और ध्यान के माध्यम से आत्मा की खोज करनी होगी। यह मार्ग कठिन है, लेकिन यही मोक्ष का मार्ग है।" यमराज ने नचिकेता को योग और ध्यान की विधियाँ सिखाईं, जो उसे आत्मसाक्षात्कार की ओर ले गईं।

नचिकेता की वापसी और संदेश

आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद, नचिकेता अपने पिता के पास लौटा। जैसा कि यमराज ने वरदान दिया था, वाजश्रवा ने उसे प्रेम से स्वीकार किया। नचिकेता ने जो ज्ञान प्राप्त किया था, उसे संसार में फैलाया और लोगों को आत्मा की अमरता और मोक्ष के मार्ग की शिक्षा दी।

कथा का संदेश

नचिकेता और यमराज की यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा साधक वह है जो सांसारिक सुखों के लालच को ठुकराकर आत्मज्ञान की खोज करता है। मृत्यु कोई अंत नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत है। आत्मा अमर है, और उसे जानना ही जीवन का परम उद्देश्य है। नचिकेता की जिज्ञासा और साहस हमें प्रेरित करते हैं कि हमें अपने जीवन में गहरे प्रश्न पूछने चाहिए और सत्य की खोज में अडिग रहना चाहिए।

आइए, हम भी नचिकेता की तरह अपने भीतर की जिज्ञासा को जागृत करें और आत्मज्ञान के मार्ग पर चलें। 

उपनिषद की प्रेरणादायक कथा: नचिकेता और यमराज (कठोपनिषद से)

 

उपनिषद की प्रेरणादायक कथा: नचिकेता और यमराज (कठोपनिषद से)

लेखक: अनंतबोध चैतन्य | श्रेणी: आध्यात्मिक ज्ञान | भाषा: हिंदी


परिचय

भारतीय दर्शन और आत्मज्ञान की परंपरा में उपनिषदों का स्थान अत्यंत ऊँचा है। इन ग्रंथों में आत्मा, ब्रह्म और जीवन-मरण के गूढ़ रहस्यों पर गहन संवाद होते हैं। आज की इस पोस्ट में हम एक ऐसी ही प्रसिद्ध कथा पर ध्यान देंगे — नचिकेता और यमराज की संवाद-गाथा, जो कठोपनिषद से ली गई है।


कथा की शुरुआत: जिज्ञासु बालक नचिकेता

बहुत समय पहले, एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण ऋषि वाजश्रवस ने स्वर्ग की प्राप्ति के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। वे अपनी सम्पत्ति दान कर रहे थे, लेकिन पुत्र नचिकेता ने देखा कि पिता जी बूढ़ी और अशक्त गायों का ही दान कर रहे हैं — जो किसी के काम की नहीं थीं।

नचिकेता ने बार-बार उनसे पूछा:

"पिताजी! आप मुझे किसे दान देंगे?"

पिता क्रोधित होकर बोले:

"मैं तुम्हें यमराज को देता हूँ!"

पिता के शब्दों को सत्य मानकर, नचिकेता बिना भय के यमलोक की ओर चल पड़ा।


यमलोक में तीन दिन का उपवास

जब नचिकेता यमलोक पहुँचा, तो यमराज वहाँ नहीं थे। वह तीन दिन तक बिना भोजन किए द्वार पर बैठा रहा। जब यमराज लौटे और देखा कि एक ब्राह्मण अतिथि भूखा बैठा है, तो उन्होंने क्षमा माँगी और तीन वर देने का वचन दिया — एक प्रत्येक दिन के प्रतीक रूप में।


तीन वरदानों की मांग

1. पहला वरदान – पिता की शांति:

नचिकेता ने माँगा कि उनके पिता शांत मन से उन्हें स्वीकार करें और उन्हें कोई क्रोध न रहे।

यमराज ने कहा:

"तथास्तु! तुम्हारे पिता तुम्हें प्रेमपूर्वक स्वीकार करेंगे।"


2. दूसरा वरदान – यज्ञ विद्या:

नचिकेता ने ‘स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाले यज्ञ’ का ज्ञान माँगा।

यमराज ने उसे 'नचिकेता अग्नि यज्ञ' की विधि बताई, जो मृत्यु के पार जाने का एक प्रतीक था।


3. तीसरा वरदान – मृत्यु के बाद क्या होता है?

यह सबसे गूढ़ प्रश्न था:

"मृत्यु के बाद आत्मा रहती है या नहीं?"

यमराज ने उसे अनेक प्रकार के भौतिक सुखों की लालच दी — धन, सौंदर्य, दीर्घायु — लेकिन नचिकेता अडिग रहा। उसने कहा:

"हे यमराज! ये सभी वस्तुएँ नश्वर हैं। मुझे केवल आत्मा और मृत्यु के रहस्य की ही जिज्ञासा है।"


यमराज का उत्तर: आत्मा का रहस्य

यमराज ने प्रसन्न होकर आत्मा का गूढ़ ज्ञान दिया:

"आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।
यह न कभी उत्पन्न हुई है, न नष्ट होती है।
जो इसे जान लेता है, वह मृत्यु और भय से परे चला जाता है।"

उन्होंने यह भी कहा कि आत्मा का ज्ञान केवल उसी को होता है जो शुद्ध, सत्यनिष्ठ और जिज्ञासु हो।


कथा से प्राप्त शिक्षा

  • सच्चा जिज्ञासु कभी भटकता नहीं।

  • आत्मा का ज्ञान ही सच्चा मोक्ष है।

  • भौतिक सुख क्षणिक हैं, आत्मज्ञान शाश्वत है।

  • गुरु या मृत्यु के समान कठोर सत्य ही वास्तविक ज्ञान दे सकते हैं।


निष्कर्ष

कठोपनिषद की यह कथा हमें यह सिखाती है कि एक साधारण बालक भी यदि सच्ची जिज्ञासा और सत्य की खोज में अडिग रहे, तो ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता है। नचिकेता आज भी उन सभी seekers के लिए प्रेरणा हैं जो आत्मा, परमात्मा और मृत्यु के पार की दुनिया को समझना चाहते हैं।


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परम ज्ञान: छान्दोग्य उपनिषद का ज्ञान


नारद की शिक्षा की खोज


एक बार नारद ऋषि सनतकुमार के पास गए और उन्होंने ऋषि सनतकुमार से ज्ञान का मार्ग दिखाने तथा परम सत्य की शिक्षा देने का अनुरोध किया।


**सनतकुमार का नारद से संवाद**


सनतकुमार ने नारद से कहा, “पहले मुझे यह बताइये कि आप कितना जानते हैं तब मैं उससे परे के ज्ञान की शिक्षा दूंगा।”


तब नारद ने विनम्रता के साथ कहा, ‘‘मुझे चारों वेदों तथा महाकाव्यों का ज्ञान है। मैंने व्याकरण, कर्मकाण्ड, गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन, मनोविज्ञान, ललित कलाओं तथा अन्य अनेक धार्मिक विषयों का अध्ययन किया है। परन्तु इन सब में से कोई भी ज्ञान आत्मज्ञान का सहायक नहीं है। मैंने आप जैसे गुरुओं से सुना है कि जो आत्मा की सिद्धि कर लेता है वह दुःख से परे चला जाता है। मैं शोक में डूब गया हूँ। कृपया मुझे इससे मुक्त होने का ज्ञान दीजिये।”


**सनतकुमार की शिक्षाएँ**


नारद तथा सनतकुमार के बीच एक लंबी वार्ता हुई जिसमें सनतकुमार ने बताया कि जो कुछ नारद जानते हैं वह केवल नाम मात्र है। उससे परे जाने के लिए यह जानना आवश्यक है कि नाम से महत्तर क्या है। तब सनतकुमार ने रहस्योद्घाटन किया कि:


1. **वाक् (वाणी):** नाम से महत्तर है।

2. **मन (चेतना):** वाक् से महत्तर है।

3. **संकल्प:** मन से महत्तर है।

4. **चेतना:** संकल्प से महत्तर है।

5. **ध्यान:** चेतना से महत्तर है।

6. **बोध:** ध्यान से महत्तर है।

7. **शक्ति:** बोध से महत्तर है।

8. **अन्न:** शक्ति से महत्तर है।

9. **जल:** अन्न से महत्तर है।

10. **प्रकाश (ताप):** जल से महत्तर है।

11. **आकाश:** प्रकाश से महत्तर है।

12. **आत्मा:** आकाश से महत्तर है तथा अन्य प्रत्येक वस्तु का तत्त्व है।


**आनन्द का स्रोत**


मनुष्य सर्वदा अपने कर्मों से प्राप्त आनन्द के कारण कुछ करने के लिए विवश रहता है। कोई भी व्यक्ति तब तक कुछ नहीं करता जब तक वह किसी प्रकार के आनन्द से प्रेरित नहीं होता। परन्तु केवल अनन्त ही स्थायी आनन्द का स्रोत है क्योंकि यह अपरिवर्तनशील है। इसलिए व्यक्ति को अनन्त का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।


**अनन्त की प्रकृति**


सनतकुमार नारद को अनन्त की प्रकृति की शिक्षा देते हैं- ‘‘जब मनुष्य जीवन की अविभाज्य एकता को सिद्ध कर लेता है तब फिर कुछ अन्य वस्तु नहीं देखता, कुछ अन्य वस्तु नहीं सुनता, कुछ अन्य वस्तु नहीं जानता। उसे ही अनन्त कहते हैं। अनन्त मृत्यु से परे है किन्तु सान्त मृत्यु से बच नहीं सकता।”


**नारद का प्रश्न**


नारद ने पूछा, ‘‘अनन्त किस वस्तु पर निर्भर करता है, हे आदरणीय महोदय ?”


**सनतकुमार का उत्तर**


सनतकुमार ने कहा, ‘‘प्रिय नारद, अनन्त अपनी ही महिमा पर निर्भर है, अन्य किसी पर भी नहीं। विश्व में लोग समझते है कि वे गौओं, अश्वों, हाथियों, स्वर्ण, परिवार, सेवकों तथा भवनों के द्वारा महिमा अर्जित कर सकते हैं। परन्तु मैं उसे महिमा नहीं कहता, क्योंकि यहाँ एक वस्तु दूसरी वस्तु पर निर्भर करती है। परन्तु अनन्त नितान्त स्वतन्त्र है। अनन्त ऊपर है, नीचे है, पहले है, पश्चात है, दक्षिण है, वाम है। मैं यह सब हूँ। आत्मा ऊपर है, और नीचे भी, पूर्व और पश्चात भी, दक्षिण और वाम भी। मैं यह सब हूँ। जो आत्मा पर ध्यान करता है और आत्मज्ञान को सिद्ध कर लेता है, वह सर्वत्र आत्मा को देखता है तथा आत्मा आनन्द का अनुभव करती है। ऐसा व्यक्ति मुक्त अनुभव करता है और जहाँ भी जाता है निश्चिंत अनुभव करता है। उसे पता चलता है कि ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु – ऊर्जा और अन्तरिक्ष, अग्नि और जल, नाम और रूप, जन्म व मरण, मन तथा संकल्प, वाणी और कर्म, मन्त्र तथा ध्यान- सब कुछ आत्मा से ही आते हैं। वह जन्म–मृत्यु के चक्र से तथा विरह और शोक के पार चला जाता है। लेकिन वे जो नाशवान वस्तुओं के पीछे भागते हैं आत्मा को देख नहीं सकते और बन्धन में पडे रहते हैं। इसलिए हे नारद, इन्द्रियों को वश में रख और मन को शुद्ध बना। शुद्ध मन में आत्मा की चेतना निरन्तर बनी रहती है। वहाँ मुक्ति बन्धन को काट देती है तथा आनन्द शोक को नष्ट कर देता है।


इस प्रकार मुनि सनतकुमार ने शुद्ध हृदय नारद को बन्धन के उस पार, शोक तथा अन्धकार से परे आत्मा के प्रकाश में जाने की शिक्षा दी।


(छान्दोग्य उपनिषद् 7.1-26)

श्वेतकेतु और प्रवाहण की कथा: आत्मा और परलोक के ज्ञान की खोज

**श्वेतकेतु की विद्वता और पांचाल राज्य की यात्रा**


श्वेतकेतु उद्दालक आरुणि के पुत्र थे। गुरुकुल में अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने अपने पिता से भी ज्ञान प्राप्त किया, जिससे वे पहले से कहीं अधिक विद्वान बन गए। श्वेतकेतु ने स्वयं को सबसे ज्ञानी मान लिया था। एक दिन उन्होंने पांचाल राज्य की राजसभा में जाने का निर्णय किया। वहाँ राजसभा में क्षत्रिय राजकुमार प्रवाहण ने उनसे कहा, "क्या आपने अपनी पूरी शिक्षा प्राप्त कर ली है, मित्र?"


श्वेतकेतु ने उत्तर दिया, "हाँ, महोदय।"


तब राजकुमार ने उनसे ये प्रश्न पूछे:


**राजकुमार प्रवाहण के प्रश्न:**


1. **प्रवाहण:** "क्या आप जानते हैं कि सभी प्राणी मृत्यु के बाद कहाँ जाते हैं?"

   - **श्वेतकेतु:** "नहीं, आदरणीय महोदय, मैं नहीं जानता।"


2. **प्रवाहण:** "क्या आप जानते हैं कि वे कैसे लौटकर आते हैं?"

   - **श्वेतकेतु:** "नहीं, आदरणीय महोदय, मैं नहीं जानता।"


3. **प्रवाहण:** "क्या आप जानते हैं कि देवयान (प्रकाश का मार्ग) और पितृयान (अंधकार का मार्ग) क्या हैं, जिनसे होकर आत्माएँ यात्रा करती हैं?"

   - **श्वेतकेतु:** "नहीं, आदरणीय महोदय, मैं नहीं जानता।"


4. **प्रवाहण:** "क्या आप जानते हैं कि परलोक में कभी भी भीड़ नहीं होती जबकि इस लोक से वहाँ बहुत लोग जाते रहते हैं?"

   - **श्वेतकेतु:** "नहीं, आदरणीय महोदय, मैं नहीं जानता।"


5. **प्रवाहण:** "क्या आप जानते हैं कि आहुति के पांचवें चरण में तात्विक पदार्थ कैसे जीवित व्यक्ति बन जाता है?"

   - **श्वेतकेतु:** "नहीं, आदरणीय महोदय, मैं नहीं जानता।"


प्रवाहण ने कहा, "तो आप कैसे कह सकते हैं कि आपकी शिक्षा पूर्ण हो गई है? ऐसा प्रतीत होता है कि आप इन विषयों के बारे में कुछ भी नहीं जानते।"


**श्वेतकेतु की निराशा और उद्दालक से संवाद**


श्वेतकेतु बहुत दुखी हुआ और अपमानित महसूस किया। वह अपने घर लौट गया और अपने पिता से कहा, "आदरणीय पिता जी, आपने कहा था कि आपने मुझे सम्पूर्ण शिक्षा दी है। लेकिन जब प्रवाहण ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे, तब मैं एक का भी उत्तर नहीं दे सका। आपने मुझे कैसे कहा कि मेरी शिक्षा पूर्ण हो गई है?" यह कहकर उसने पिता को उन प्रश्नों और राजसभा में अपनी अपमानजनक स्थिति के बारे में बताया।


उद्दालक ने ध्यानपूर्वक सुना और कहा, "प्रिय बालक, विश्वास करो कि मैं स्वयं इन प्रश्नों के उत्तर नहीं जानता। यदि मैं जानता होता, तो क्या मैं तुम्हें नहीं बताता?" यह कहकर उद्दालक ने राजकुमार प्रवाहण से इन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए पांचाल की राजसभा में जाने का निर्णय किया।


**उद्दालक की प्रवाहण से भेंट और ज्ञान प्राप्ति**


राजमहल में उद्दालक का आदरपूर्वक स्वागत किया गया। अगले दिन सुबह, जब वे राजसभा में गए, तो प्रवाहण ने उनसे कहा, "श्रद्धेय मुनिवर, धन-सम्पत्ति सभी को प्रिय होती है। मैं आपको धन अर्पित करता हूँ, जितना चाहे मांग लें।"


उद्दालक ने कहा, "हे उदारचेता राजकुमार, धन-सम्पत्ति अपने पास ही रहने दीजिए, परन्तु उन प्रश्नों के उत्तर बताइए जो आपने मेरे पुत्र श्वेतकेतु से पूछे थे। मैं परलोक के ज्ञान के बारे में जानने के लिए उत्सुक हूँ।"


राजकुमार थोड़े से क्षुब्ध हो गए परंतु मुनि की मनोवृत्ति से प्रसन्न भी हुए। उन्होंने उद्दालक को अपने महल में लम्बे समय तक ठहरने का अनुरोध किया। अवधि के अंत में प्रवाहण ने उद्दालक से कहा, "हे श्रद्धेय गौतम (उद्दालक का एक अन्य नाम), आपसे पूर्व यह ज्ञान किसी ब्राह्मण को नहीं दिया गया। परंपरा से यह ज्ञान केवल क्षत्रियों को ज्ञात था। अब एक ब्राह्मण एक क्षत्रिय राजा से यह ज्ञान प्राप्त कर रहा है।" यह कहकर प्रवाहण ने उद्दालक को उन प्रश्नों का उत्तर देना शुरू किया जो उन्होंने श्वेतकेतु से पूछे थे।


**प्रवाहण की शिक्षाओं का सार:**


प्रवाहण की शिक्षाओं का सार इस प्रकार है:


1. **तात्विक पदार्थ का प्राण में परिवर्तन:**

   - तात्विक पदार्थ पाँच भिन्न चरणों से होकर गुजरने के बाद प्राण या व्यक्ति में परिवर्तित हो जाता है। ये पाँच चरण पाँच भिन्न आहुतियों के प्रतीक हैं।

   - पहले चरण में तात्विक पदार्थ अग्नि या सूर्य की आहुति बनता है, जिससे प्राणदायक सोम रस उत्पन्न होता है।

   - दूसरी आहुति में यह सोम पर्जन्य को अर्पित किया जाता है, जिससे वर्षा होती है।

   - पृथ्वी पर वर्षा के जल से अन्न उत्पन्न होता है।

   - जब मनुष्य अन्न खाता है, तो चौथी आहुति के रूप में इसकी पाचन क्रिया से रेतस या प्राणिक तरल पदार्थ उत्पन्न होता है। यह रेतस पुरुष और स्त्री में अलग-अलग रूप ग्रहण करता है।

   - जब पांचवीं आहुति के रूप में पुरुष का रेतस स्त्री के रेतस से संयुक्त होता है, तो भ्रूण की उत्पत्ति होती है और भ्रूण से ही शिशु का जन्म होता है।


2. **आत्मा की नियति:**

   - मनुष्य का भौतिक शरीर उन तत्वों में विलीन हो जाता है, जिनसे वह बना होता है।

   - परंतु आत्मा की नियति उसके कर्मों और अर्जित ज्ञान पर निर्भर करती है।

   - जिसने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित कर लिया है, वह प्रकाश के मार्ग से जाता है और फिर पृथ्वी पर लौटकर नहीं आता।

   - जिसने आध्यात्मिक ज्ञान नहीं प्राप्त किया है या आंशिक रूप से किया है, वह अंधकार के मार्ग से जाता है और जन्म और मृत्यु के अनंत चक्र में फंसकर कष्ट झेलता है।

   - कुछ लोग ब्रह्मलोक में जाते हैं और पुनः लौटकर नहीं आते। कुछ लोग स्वर्ग जाते हैं और कुछ समय तक वहाँ रहते हैं, फिर पृथ्वी पर अपने कर्मों को पूरा करने के लिए लौट आते हैं।

   - अधिकतर लोग जन्म-मृत्यु के अनंत चक्र में फंस जाते हैं। यही कारण है कि परलोक में कभी भी भीड़ नहीं होती।


**निष्कर्ष:**


जीवन और इसके उद्गम, तथा मृत्यु के बाद आत्मा की नियति का यही ज्ञान है जो क्षत्रिय राजा प्रवाहण ने उद्दालक मुनि को दिया था। इस ज्ञान ने श्वेतकेतु को यह समझने में मदद की कि वास्तविक ज्ञान क्या है और उसे प्राप्त करने के लिए कितनी गहनता से अध्ययन और साधना की आवश्यकता होती है।

किससे प्रेरित होकर विश्व गति करता है?


केनोपनिषद का प्रसंग


**संध्या की प्रार्थना और प्रश्नोत्तर सत्र**


संध्या की प्रार्थना समाप्त हो चुकी थी और अब प्रश्नोत्तर का समय था। ऋषि शांत भाव से बैठे थे, जैसे निष्कम्प ज्योति। एक छात्र ने प्रश्न किया:


“मेरे मन को सोचने के लिए कौन प्रेरित करता है?  

मेरे शरीर में कौन प्राण डालता है?  

किसकी शक्ति से जिह्वा बोलती है?  

वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो मेरी आंखों से देखती है और मेरे कानों से सुनती है?”


ये प्रश्न वास्तव में कठिन थे। 


**ऋषि का उत्तर**


ऋषि ने स्नेहभरी दृष्टि से शिष्यों की ओर देखा और शांत भाव से बोले:


“प्रिय बालकों! जो शक्ति इन सबको प्रेरित करती है, वह एक ही है और अविभाज्य है। यह उन सबके पीछे और उनसे परे है जो दृश्य जगत में कार्यशील हैं। यह कान का कान है, नेत्र का नेत्र, मन का मन, शब्द का शब्द है और प्राणों का प्राण है। उसे हमारी आँखें नहीं देख सकतीं, शब्द व्यक्त नहीं कर सकते। उसे मन से भी समझा नहीं जा सकता। हम लोग उसे जान नहीं सकते, उसे समझ नहीं सकते, क्योंकि वह ज्ञात और अज्ञात दोनों से भिन्न है। वही हमारी जिह्वा को बोलने के लिए प्रेरित करती है किंतु जिह्वा उसके बारे में कुछ नहीं बोल सकती। वही मन को सोचने के लिए प्रेरित करती है किंतु मन उसके बारे में कुछ सोच नहीं सकता। वह आँखों को देखने की शक्ति देती है पर वह स्वयं आँखों के द्वारा देखी नहीं जा सकती। कान उसी के द्वारा सुनने में समर्थ होते हैं परंतु कानों के द्वारा उसे नहीं सुना जा सकता। वही हमें श्वास लेने की शक्ति प्रदान करती है किंतु उसका श्वास नहीं लिया जा सकता। यह शक्ति वास्तव में आत्मा है और यह आत्मा तुमसे भिन्न नहीं है। जो इस सत्य को जानता और सिद्ध कर लेता है, वह अमरत्व का आनंद प्राप्त कर लेता है।”


**शिष्य की प्रतिक्रिया और ऋषि की शिक्षा**


समय बीतने पर ऋषि पुनः बोले, “यदि तुम समझते हो कि तुम आत्मा को जानते हो, तब वास्तव में तुम उसे नहीं जानते, क्योंकि जो कुछ तुम देखते हो वह सब उसका बाह्य रूप है। इसलिए इस आत्मा पर ध्यान करते रहो।”


विद्यार्थी ने उत्तर दिया, “मैं नहीं समझता कि मैं आत्मा को जानता हूँ और न ही मैं यह कह सकता हूँ कि मैं उसे नहीं जानता।”


ऋषि ने समझाया, “जो कहता है कि ‘मैं जानता हूँ’ वह नहीं जानता। वह कदाचित ही जानता है। किंतु वास्तविक जिज्ञासु जो यह कह कर आरंभ करता है कि ‘मैं नहीं जानता’ वह कालक्रम में जान जाता है। इससे क्रमशः उसका मन प्रकाशित होने लगता है। पूर्ण सिद्धि मिल जाने पर आत्मा सर्वदा चेतना की सभी अवस्थाओं में उपस्थित रहती है। उसकी अंतरात्मा निरंतर बलीवती होती जाती है और निष्कलंक उपस्थिति की सिद्धि की शक्ति द्वारा वह अमरत्व प्राप्त कर लेता है।”


**नीति कथा: देवों और ब्रह्म का प्रसंग**


तत्पश्चात, ऋषि ने एक नीति कथा सुनाई: एक बार देवों ने दानवों को परास्त कर दिया। यद्यपि यह विजय ब्रह्म की शक्ति से मिली थी, देवों ने अहंकार के साथ कहा, “हमने अपनी शक्ति और महिमा से विजय प्राप्त कर ली।” ब्रह्म ने उनके अहंकार को देखा और उनके समक्ष प्रकट हुए। किंतु देवगण, अहंकार और मिथ्याभिमान से अंधे हो चुके थे, उन्हें पहचान नहीं पाए। उन्होंने केवल यह देखा कि उनके समक्ष एक आश्चर्यजनक सत्ता उपस्थित है। वे जानना चाहते थे कि वह सत्ता कौन है। उन्होंने अग्निदेव से उस रहस्यमय सत्ता के बारे में पता करने के लिए कहा।


अग्निदेव उस रहस्यमय सत्ता के निकट गए। सत्ता ने पूछा, “तुम कौन हो?” अग्निदेव ने कहा, “मैं अग्नि का देवता हूँ।” सत्ता ने पूछा, “तुम्हारी शक्ति क्या है?” अग्निदेव ने उत्तर दिया, “मैं पृथ्वी की समस्त वस्तुओं को जला सकता हूँ।” सत्ता ने उसके सामने एक तिनका रखते हुए कहा, “क्या इस तिनके को जला सकते हो?” अग्निदेव ने अपनी पूरी शक्ति लगाई किंतु तिनके को नहीं जला सके। वे देवों के पास लौट गए और अपनी विफलता स्वीकार कर ली।


फिर देवों ने वायुदेव को उस रहस्यमय सत्ता के बारे में जानने के लिए भेजा। वायुदेव भी उस सत्ता के सामने अपनी शक्ति प्रमाणित नहीं कर सके और निराश लौट आए।


अंततः देवों ने देवराज इंद्र से अनुरोध किया। इंद्र के आने पर वह रहस्यमय सत्ता अदृश्य हो गई और उसके स्थान पर एक सुंदर देवी उमा, हिमालय की पुत्री, स्वर्णमयी देवी प्रकट हुईं। इंद्र ने उनसे पूछा, “वह रहस्यमयी सत्ता कौन थी?”


स्वर्णमयी देवी ने उत्तर दिया, “वे स्वयं परम पुरुष ब्रह्म थे जिनसे तुम लोगों की शक्ति और महिमा आती है। उन्होंने ही दानवों पर विजय प्राप्त की।” इंद्र ने यह सत्य अन्य देवों को बताया। तब देवताओं ने अपने दोष का अनुभव किया।


**निष्कर्ष**


ऋषि ने इस कथा का सारांश प्रस्तुत करते हुए कहा, “ब्रह्म का प्रकाश विद्युत की चमक और हमारी आंखों की दृष्टि में चमकता है। ब्रह्म की शक्ति से ही मन सोचता, कामना और संकल्प करता है। यह परात्पर और सर्वव्यापी सत्य का ज्ञान है। सत्य ब्रह्म का शरीर और निवास स्थल है। सभी ज्ञान इसके अंग प्रत्यंग हैं। ध्यान, इंद्रियों और कामना का निग्रह, सबकी निःस्वार्थ सेवा इसके आधार हैं। ब्रह्म को सिद्ध करने वाले सब दोषों से मुक्त हो जाते हैं और परमपद प्राप्त कर लेते हैं।”


शिष्यगण अपने गुरु की शिक्षा से प्रसन्न होकर, आनंद के साथ अपने-अपने आवास में लौट गए, उस विषय पर चिंतन और मनन करने के लिए।

भागवत सिद्धि के सोपान

**भृगु और वरुण की कथा**


प्राचीन काल की इस कथा में वरुण के पुत्र भृगु ने शाश्वत ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपने पिता से मार्गदर्शन मांगा। वरुण ने भृगु को बताया कि शाश्वत को प्राप्त करने के सोपान अन्न, प्राण, नेत्र, कर्ण, मन और वाणी हैं। उन्होंने समझाया कि ये सभी तत्व शाश्वत से उत्पन्न होते हैं, उसी से जीवित रहते हैं और अंत में उसी में विलीन हो जाते हैं। भृगु को शाश्वत प्राप्त करने के लिए तपस्या और एकाग्रता करने की सलाह दी गई।


**पहला सोपान: अन्न**


भृगु ने अपनी चेतना को एकाग्र किया और पाया कि अन्न (भौतिक पदार्थ) शाश्वत है। अन्न से प्राणियों का जन्म होता है, वे अन्न से ही जीवित रहते हैं और अंत में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं। जब भृगु ने अपनी इस सिद्धि के बारे में अपने पिता को बताया, तो वरुण ने उसे और गहरी एकाग्रता से विचार करने के लिए कहा।


**दूसरा सोपान: प्राण**


इस बार भृगु ने गहन एकाग्रता के द्वारा अनुभव किया कि प्राण ही शाश्वत तत्व है। प्राण से प्राणियों का जन्म होता है, वे प्राण से ही जीवित रहते हैं और प्राण में ही लौट जाते हैं। भृगु ने यह अनुभव भी अपने पिता को बताया, लेकिन वरुण ने उसे और गहरे ध्यान में जाने की सलाह दी।


**तीसरा सोपान: मानस**


भृगु ने और अधिक गहन ध्यानावस्था में जाना और पाया कि मानस (मन) ही शाश्वत तत्व है। मानस से ही प्राणियों का जन्म होता है, वे मानस के द्वारा ही जीवित रहते हैं और अंत में मानस में ही लौट जाते हैं। भृगु ने फिर अपनी इस सिद्धि को अपने पिता से साझा किया, लेकिन वरुण ने उसे और गहरी एकाग्रता में जाने को कहा।


**चौथा सोपान: ज्ञान**


इस बार भृगु ने अनुभव किया कि ज्ञान ही शाश्वत तत्व है। ज्ञान से ही प्राणियों का जन्म होता है, वे ज्ञान से ही जीवित रहते हैं और अंत में ज्ञान में ही लौट जाते हैं। इस अनुभूति को भी उसने अपने पिता से बताया, परंतु वरुण ने उसे और गहरे ध्यान में जाने की सलाह दी।


**अंतिम सोपान: परमानन्द**


भृगु ने अपनी चेतना को और भी गहरी एकाग्रता में ले जाकर अनुभव किया कि परमानन्द ही शाश्वत तत्व है। परमानन्द से ही सभी प्राणियों का जन्म होता है, वे उसी में निवास करते हैं और अंत में आनन्द में ही लौट जाते हैं। इस बार भृगु को न केवल शाश्वत की अनुभूति हुई बल्कि वह उसके साथ तदात्म भी हो गया।


**समापन**


जब वरुण ने जाना कि भृगु ने शाश्वत की सिद्धि कर ली है, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भृगु को बधाई दी और कहा कि अब उसे शाश्वत के विषय में और शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसने न केवल शाश्वत को जान लिया है, बल्कि उसके साथ तदात्म भी कर लिया है।


यह कथा तैत्तिरीय उपनिषद् के भृगुवल्ली खंड में वर्णित है और यह ज्ञान के विभिन्न सोपानों के माध्यम से शाश्वत सत्य की प्राप्ति की प्रक्रिया को दर्शाती है।

याज्ञवल्क्य तथा मैत्रेयी

 उपनिषद काल के एक महान ऋषि याज्ञवल्क्य अपनी अद्भुत आध्यात्मिक प्रज्ञा और शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। वे शुक्ल यजुर्वेद संहिता के ऋषि थे और उन्हें शतपथ ब्राह्मण, योग याज्ञवल्क्य संहिता तथा याज्ञवल्क्य स्मृति के रचयिता माना जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद के तीसरे और चौथे अध्याय में याज्ञवल्क्य की महत्वपूर्ण दार्शनिक शिक्षाएं मिलती हैं।


देवरात ऋषि के पुत्र याज्ञवल्क्य एक गृहस्थ के रूप में जीवन यापन कर रहे थे। उनकी दो पत्नियाँ थीं - मैत्रेयी और कात्यायनी। कात्यायनी घर-गृहस्थी की देखभाल करती थीं और पत्नी धर्म का पालन करती थीं। दूसरी ओर, मैत्रेयी को आध्यात्मिक वार्ताओं में रुचि थी और वे अपने पति के साथ बैठकर शिष्यों के साथ उनके संवाद सुनती थीं। इसलिए उन्हें ब्रह्मवादिनी कहा जाता था।


अपने जीवन के अंतिम चरण में याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ जीवन त्यागने और वन में एकांतवास का निर्णय लिया। एक दिन उन्होंने मैत्रेयी को बुलाकर कहा, “मैत्रेयी, मैं सब कुछ छोड़कर गृहत्याग करने जा रहा हूँ। यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हारे और कात्यायनी के लिए पृथक-पृथक व्यवस्था कर सकता हूँ।”


यह सुनकर मैत्रेयी ने पूछा, “स्वामी, यदि मैं सम्पदा से पूरी धरती भी भर लूँ तो क्या मुझे अमरत्व प्राप्त होगा?”


याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, “नहीं, प्रिय, इससे तुम्हें अमरत्व प्राप्त नहीं होगा। तुम सम्पन्न व्यक्तियों के समान भोग का जीवन जी सकोगी, परन्तु अमरत्व की आशा नहीं कर सकोगी।”


मैत्रेयी ने भावोद्गार से कहा, “तब मैं उस सम्पत्ति का क्या करूँ जो मुझे अमरत्व नहीं दे सकती?”


याज्ञवल्क्य ने कहा, “तुम मेरी प्रिय हो, और अब तुम और प्रिय हो गई हो।” इसके बाद याज्ञवल्क्य ने उन्हें वास्तविक प्रेम, परम सत्ता की महानता, सृष्टि की प्रकृति, अनन्त ज्ञान और अमरत्व की विधि समझाई।


“प्रिय मैत्रेयी, जान लो कि पत्नी अपने पति को उसके लिए नहीं, बल्कि अपने आत्मा के लिए प्रेम करती है। वह वास्तव में केवल परम सत्ता को ही प्रेम करती है जो दोनों में है, पति और पत्नी में भी। इसी तरह पति भी पत्नी को अपने आत्मा के लिए प्रेम करता है। सभी प्रेम सम्बन्धों में यही सत्य है। प्रिय लगने वाली कोई भी वस्तु उसी एकमात्र आत्मा के कारण प्रिय होती है। इसी आत्मा को देखना, सुनना, उसके बारे में चिंतन करना और ध्यान करना चाहिए। इसका ज्ञान हो जाने पर अन्य सभी का ज्ञान स्वतः हो जाता है।”


“प्रिय मैत्रेयी, जैसे सागर के बिना जल का अस्तित्व नहीं है, त्वचा के बिना स्पर्श का, नासिका के बिना गंध का, जिह्वा के बिना स्वाद का, दृष्टि के बिना रूप का, कर्ण के बिना ध्वनि का, मन के बिना विचार का, श्रवण के बिना प्रज्ञा का, हस्त के बिना कर्म का, चरण के बिना चलने का और वाणी के बिना शास्त्र का कोई अस्तित्व नहीं होता वैसे ही आत्मा के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं हो सकता।”


“जिस प्रकार जल में लवण विलीन हो जाता है और पुनः पृथक नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार पृथक आत्मा शुद्ध चेतना के सागर में विलीन हो जाती है। पृथक्कता देह के साथ आत्मा के तादात्म्य से आती है। जब यह भौतिक तादात्म्य विलीन हो जाता है तब पृथक आत्मा नहीं रहती। यही मैं तुम्हें बताना चाहता था, मेरी प्रिय।”


मैत्रेयी ने उत्तर दिया, “हे धन्य आत्मा, आपने कहा कि कोई पृथक आत्मा नहीं होती। मैं इसे समझ नहीं पाई और भ्रम में हूँ। कृपया इसे स्पष्ट करें।”


याज्ञवल्क्य ने कहा, “प्रिय मैत्रेयी, जो मैंने कहा है उस पर चिंतन करो। तुम्हारा भ्रम दूर हो जाएगा। जब तक पृथक्कता है तब तक व्यक्ति देखता है, सुनता है, गंध की अनुभूति करता है, किसी से बात करता है, किसी वस्तु के बारे में सोचता है और उसे जानता है। परन्तु जब आत्मा की सिद्धि जीवन की अविभाज्य एकता के रूप में हो जाती है तब कौन किसके द्वारा देखा जा सकता है, गंध किसके द्वारा अनुभव की जा सकती है, और किसके द्वारा कौन जाना जा सकता है? हे मैत्रेयी, ज्ञाता को कैसे कभी भी जाना जा सकता है?”


यह सुनकर मैत्रेयी मौन हो गई और उन्हें दी गई शिक्षाओं पर चिंतन करने लगी, और अंततः अनन्त और अमर्त्य में विलीन हो गई।

सत्यकामः - सत्य का जिज्ञासु

 एक दिन एक किशोर बालक हरिद्रुमत गौतम मुनि के आश्रम में आया और बोला, “मैं आपके संरक्षण में विद्याध्ययन करना चाहता हूँ। कृपया मुझे एक ब्रह्मचारी के रूप में स्वीकार करें।”


मुनि ने पूछा, “बालक, तुम्हारा गोत्र क्या है?”


बालक ने उत्तर दिया, “मुनिवर, मुझे अपना गोत्र नहीं पता। मैंने अपनी माँ से पूछा, लेकिन उसने कहा, ‘मैं भी नहीं जानती। युवावस्था में कई लोगों की सेवा में रही, और तभी तुम्हारा जन्म हुआ। मैं यह नहीं कह सकती कि तुम किस वंश के हो। लेकिन मैं जाबाला हूँ और तुम सत्यकाम हो।’ इसलिए मुनिवर, मुझे सत्यकाम जाबाला के रूप में स्वीकार करें।”


यह सुनकर ऋषि हरिद्रुमत गौतम मुस्कुराए और बोले, “केवल ब्राह्मण ही ऐसा सत्य बोल सकता है। प्रिय बालक, यज्ञ के लिए समिधा ले आओ। मैं तुम्हें ब्रह्मचर्य की दीक्षा दूंगा, क्योंकि तुम सत्य से विचलित नहीं हुए।”


इस प्रकार सत्यकाम जाबाला ब्रह्मचारी के रूप में दीक्षित हो गया।


कुछ समय बाद, ऋषि हरिद्रुमत गौतम ने 400 दुबली और दुर्बल गायों को एकत्रित किया और सत्यकाम से कहा, “प्रिय बालक, इन गायों को वन में ले जाओ और चराओ।”


सत्यकाम ने गायों को हांकते हुए विनम्र भाव से नतमस्तक होकर कहा, “मान्यवर, मैं तभी लौटूंगा जब ये गायें एक सहस्र हो जाएंगी।”


सत्यकाम वन में रहते हुए गायों की देखभाल करता रहा। कई साल बीत गए। जब गायों की संख्या एक सहस्र हो गई, एक दिन संध्या के समय एक वृषभ उसके पास आया और बोला, “प्रिय बालक, हम अब एक सहस्र हो गए हैं। अब हमें गुरु गृह ले चलो।” वृषभ ने कहा, “मैं तुम्हें ब्रह्म का एक चौथाई ज्ञान दूंगा। वह प्रकाशवान है। जो व्यक्ति ब्रह्म को प्रकाशवान रूप में ध्यान करता है, वह इस संसार में प्रकाशवान बन जाता है।” वृषभ ने यह भी कहा कि आगे अग्निदेव तुम्हें ज्ञान देंगे।


प्रातःकाल सत्यकाम गायों के साथ गुरु के आश्रम की ओर चल पड़ा।


संध्या समय में एक स्थान पर गायों को एकत्रित कर उसने अग्नि प्रज्वलित की, समिधा डाली और पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया। तब अग्निदेव बोले, “प्रिय बालक, मैं तुम्हें ब्रह्म का एक चौथाई ज्ञान दूंगा। वह अनन्तवान है। जो इसे इस रूप में जानता है और अनन्त रूप में ध्यान करता है, वह इस संसार में अनन्त बन जाता है।” अग्निदेव ने कहा कि आगे एक हंस तुम्हें ब्रह्म का तीसरा चौथाई ज्ञान देगा।


दूसरे दिन सत्यकाम प्रातःकाल गायों को गुरु के आश्रम की ओर ले जाने लगा। संध्या समय में जब गायें एकत्रित हो गईं, उसने अग्नि प्रज्वलित की, समिधा डाली और पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया। तभी एक हंस उड़ता हुआ आया और बोला, “सत्यकाम, मैं तुम्हें ब्रह्म का तीसरा चौथाई ज्ञान दूंगा। वह ज्योतिष्मान है। जो उसे इस रूप में जानता है और ज्योतिष्मान के रूप में ध्यान करता है, वह संसार में ज्योतिष्मान बन जाता है।” हंस ने यह भी कहा कि आगे एक जल कुक्कुट तुम्हें ब्रह्म का अंतिम चौथाई ज्ञान देगा।


दूसरे दिन प्रातःकाल सत्यकाम फिर से गायों को गुरु के आश्रम की ओर हांकने लगा। संध्या होने पर उसने गायों को एकत्रित किया, अग्नि प्रज्वलित की, समिधा डाली और पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया। तब एक जल कुक्कुट आया और बोला, “सत्यकाम, मैं तुम्हें ब्रह्म का अंतिम चौथाई ज्ञान दूंगा। वह आयतनवान सर्वाधार है। जो इसे इस रूप में जानता है और आयतनवान के रूप में ध्यान करता है, वह संसार में तत् बन जाता है।” जब सत्यकाम एक सहस्र गायों के साथ गुरु के आश्रम में पहुंचा, तब गुरु ने सत्यकाम से पूछा, “प्रिय बालक, तुम्हारा मुखमंडल ब्रह्मज्ञान से प्रदीप्त हो रहा है। किसने तुम्हें यह ज्ञान दिया?”


सत्यकाम ने चार गुरुओं के बारे में बताया और कहा, “मान्यवर, मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप स्वयं इसका प्रतिपादन कर मुझे समझाएं, क्योंकि मैं जानता हूँ कि अपने गुरु से साक्षात प्राप्त ज्ञान पूर्ण होता है।”


तब ऋषि हरिद्रुमत गौतम ने उसे उसी ज्ञान को विस्तार से समझाया। इस प्रकार सत्यकाम ने अपने गुरु से पूर्ण ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया और वह स्वयं भी एक महान गुरु बन गया।

6th Mantra of 1st Chapter of Prashanopanishad


स यथेमा नध्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिध्येते तासां नामरुपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिध्येते चासां नामरुपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥

sa yathemā nadhyah syandamānāh samudrayānāh samudram prāpya tāsām gacchanti bhidhyete tāsām nāmarūpe samudra ityevam prochyate | evamevāsya paridrasturimāh shodashakalāh purushāyanāh purusham prāpya tāsām gacchanti bhidhyete chāsām nāmarūpe purush ityevam prochyate sa esho'kalo'mrito bhavati tadeṣa ślokaḥ ||

जैसे इन नदियों का जल समुद्र में मिल जाता है और वे अपने अलग-अलग नाम और रूपों को खो देती हैं, बस समुद्र हो जाती हैं, उसी तरह, जो लोग पुरुषायण पथ पर निकलते हैं, वे परम पुरुष को प्राप्त करते हैं और उनसे एक हो जाते हैं, अपनी अलग-अलग पहचान को खो देते हुए बस "पुरुष" कहलाते हैं। यह अमृतत्व की अंतिम स्थिति है। यह श्लोक है।

Just as these rivers, flowing from different directions, merge into the ocean and lose their individual names and forms, being called simply “ocean,” similarly, those who undertake the journey of Purushayana, the path of the Supreme Person, attain the Supreme Person and become one with Him, losing their individuality and being known simply as “Purusha.” This is the ultimate state of immortality. This is the verse.

नचिकेता का साहस

 


नचिकेता का साहस

बात बहुत पुरानी है । उस समय हमारे देश में यज्ञों का बहुत प्रचार था । हर एक गाँव में महीने भर में दो-चार यज्ञ हुआ करते थे । यज्ञ के सुगंधित धुएँ से आकाशमण्डल धूमिल बना रहता था । पवित्र शान्त सुगन्धित पवन के मन्द- मन्द झोकों से चारों ओर का वातावरण बहुत स्वास्थ्यप्रद और रमणीक बना रहता था । वेद के पवित्र मन्त्रों के उच्चारण से दिशाएँ गूंजती रहती थीं। लोगों के दिन आनन्द और मस्ती में क्षरण के समान बीतते थे। न किसी को खाने-पीने की कमी रहती थी और न शत्रुता का भय । सभी लोग सत्य बोलते थे, जीवमात्र के लिए मन में उपकार की भावना रखते थे और किसी छल छिद्र का उन्हें कोई पता नहीं रहता था । ऐसे पवित्र सत्य युग में महर्षि गौतम के वंश में बाजश्रवा के पुत्र उद्दालक नाम के एक महात्मा ऋषि हुए थे । उद्दालक की गृहस्थी बहुत बड़ी तो नहीं थी, पर गौओ का एक बहुत बड़ा झुण्ड उनके पास अवश्य था । वेदाभ्यास में निरत एक तपस्वी ब्राह्मण के लिए उस समय वह बहुत बड़ी सम्पत्ति थी ।


जब उद्दालक वृद्ध हो चले तो एक दिन उनके मन में यह विचार आया कि 'सारी उमर बीतती जा रही है, अभी तक मैंने कोई बड़ा यज्ञ नहीं किया । इन छोटे-छोटे यज्ञों के क्या मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है ? यह धन-सम्पत्ति और किस काम आएगी ? इनके रखने से भी तो शांति नहीं मिलती, सन्तोष नहीं होता । अच्छा होगा कि सर्वमेध यज्ञ करके गृहस्थी का सारा भार बहुत कुछ 'कम कर दिया जाय ।'


इस तरह बहुत कुछ सोचने-विचारने के बाद उद्दालक ने सर्वमेघ यज्ञ करने का विचार पक्का किया । सर्वमेध कोई मामूली यज्ञ नहीं था, उसे बड़े-बड़े राजा लोग करते थे । उसमें यजमान को अपना सब कुछ दक्षिणा में दान कर देना पड़ता था । उसके लिए शास्त्रों में कहा गया है कि 'जो सच्चे भाव से सर्वमेध यज्ञ करता है, वह मृत्यु को जीत लेता है और संसार के सभी दुःखों से सदा के लिए छुटकारा पा जाता है ।'


उद्दालक का सर्वमेध यज्ञ प्रारम्भ हो गया। देश के कोने-कोने के बड़े-बड़े विद्वान्, पण्डित और महात्मा लोग उस यज्ञ में सम्मिलित हुए। इस यज्ञ मे उद्दालक ने सचमुच  अपनी सारी गृहस्थी समाप्त कर दी । पूर्णाहुति का पुण्य दिन आया, वेदों के पवित्र मंत्रों का उच्चारण करते हुए पण्डितों ने आकाश मंडल को गुंजा दिया । यज्ञधूम की चंचल सुगन्धित लहरें क्षितिज तक व्याप्त हो गयीं । पुण्यात्मा उद्दालक ने मांगलिक गीतों और वाद्यों की आकाश-भेदी ध्वनियों के बीच में नारियल की अन्तिम आहुति यज्ञकुण्ड में समर्पित की और चारों ओर से उनका जय-जयकार होने लगा । अब पुरोधा पण्डितों तथा आगत महात्माओं को दक्षिणा देने की बेला आयी । गोओं को छोड़कर उद्दालक के पास कोई वस्तु शेष नहीं थी, अतः वह उनमें से एक-एक गाय दक्षिणा रूप में देने लगे ।


अपनी सब गौओ का दान करते समय उद्दालक की पवित्र आत्मा भी सर्वस्व त्याग की कठोरता से काँप उठी। वह मन ही मन सोचने लगे- 'सब गोएँ दे डालने पर जीविका कैसे चलेगी ? बेटा भी अभी उम्र का छोटा है, क्या वह जायगा ? मेरा वृद्ध शरीर भी अब इस योग्य नहीं रहा कि परिश्रम करके प्रति दिन की जीविका पैदा कर सकूं।' वह सचमुच विचलित हो गए। लोभ की इस क्षीण काली रेखा ने धीरे-धीरे उनके निर्मल हृदय में घना रूप बना लिया । उन्होंने गौधों के समूह की ओर दृष्टि डाली, देखा तो जितने पण्डित अभी शेष थे, उससे अधिक गौएँ बचती थीं, मगर उनमें बहुतेरी बुड्ढी गौऐं भी थीं। वह तुरन्त ही कुश और अक्षत को नीचे रखकर गौधों के समूह की ओर चले गये । वहाँ कपट से विचलित होकर अच्छी-अच्छी गौधों को पीछे की ओर छोड़कर बुड्ढी और अधेड़ गौधों को आगे की ओर हाँक लाये और उसी में से एक-एक करके पण्डितों को दक्षिणा में देने लगे। उनकी इस चालाकी का पता किसी को कानों कान नहीं लगा; पर उनका बेटा नचिकेता, जिसकी उमर अभी दस- बारह साल से कम ही थी, यह सब चुपचाप देख रहा था ।


नचिकेता का निष्पाप कोमल हृदय पिता की इस काली करतूत पर कांप उठा । उसने देखा कि महीनों तक अनवरत परिश्रम करनेवाले पुरोहितों और पण्डितों को ऐसी-ऐसी गौएँ दो जा रही हैं, जो एकदम बुड्ढो हो चली हैं, न उनसे बछड़े की कोई आशा है, न दूध की । यहाँ तक कि उनमें से कुछ इतनी जर्जर हो गई हैं, जो न कुछ खा सकती हैं, न अधिक पानी ही पी सकती हैं। इन जीवन्मृत गौधों को दान में देकर पिताजी पण्डितों के साथ कितना विश्वासघात कर रहे हैं—यह सोचकर वह बहुत ही दुःखी हुपा । उसने पीछे को मोर देखा तो बड़ी अच्छी-प्रच्छो गौएँ चर रही थीं, और उद्दालक उनकी थोर तनिक भी ध्यान न देकर इन जर्जरित गोपों का चुपचाप दान करते जा रहे थे । सामने जितनी वृद्ध गौएँ खड़ी थीं, उतने हो पण्डितों को दान भी देना शेष था । नचिकेता सोचने लगा- 'क्या पिताजी सचमुच सर्वमेध यज्ञ कर रहे हैं ? नहीं, नहीं। यह पापमेघ है, कपटमेध है, सर्वमेध नहीं । शायद पिताजी मेरे लिए इनको रख छोड़ते हों। हाँ। मगर उन्हें ऐसा तो नहीं करना चाहिए । यज्ञनारायण के साथ कपट करके वह मेरा कल्याण किस प्रकार कर सकते हैं ? इस प्रकार के कपट व्यापार से बचाई गई ये गोएँ मेरा भी सत्यानाश कर देंगी । पण्डितों का मूक अभिशाप हमारे परिवार का भाषण विनाश कर देगा। पिताजी गिर रहे हैं, इनको बचाना या ठोक रास्ते पर लाना मेरा कर्तव्य होता है। मुझे ऐसे अवसर पर चुप नहीं रहना चाहिए।' विचारों के इस प्रखर प्रवाह में बहकर नचिकेता पिता के समीप गया और हाथ जोड़कर बोला- 'तात ! यह तो सर्व- मेघ यज्ञ है न ?'


उद्दालक का मुख भीतरी पाप की काली छाया से उस समय मलिन पड़ रहा था । ब्रह्मवर्चस् एवं सर्वस्व त्याग की वह आभा, जो अभी तक उनके उन्नत ललाट में दीपशिखा के समान जल रही थी, राख-सी काली पड़ गई थी। पुत्र की सुमधुर विनीत वाणी में 'सर्वमेध' का नाम सुनकर वह भीतर से और भी काँप उठे । परन्तु चुप कैसे रह सकते थे ? मुख पर मुस्कराहट की बनावटी रेखा बनाते हुए बोले- 'हाँ वत्स ! यह स.... स सर्वमेध यज्ञ है । बात क्या है ?'


उद्दालक तुतलाते तो नहीं थे, पर पाप तो शिर पर चढ़कर बोलता है ! अपनी दुष्कृति पर वह फिर से काँप उठे। पर, पाप तो उन्हें अपने पथ पर बहुत दूर तक खीच चुका था, वहाँ से लौटना उद्दालक जैसे के लिए भी आसान काम नहीं रह गया था।


नचिकेता चुप बना रहा। फिर श्रागे बोलने की उसमें सहसा हिम्मत नहीं पड़ी। वह समझता था कि 'सर्वमेध' का स्मरण दिला देना ही पिताजी के लिए पर्याप्त होगा; पर उसके पिता यह कैसे समझते कि नचिकेता क्या चाहता है ? फिर वह उन्हीं बुड्ढी गौधों में से एक गाय लाकर सामने बैठे हुए पुरोहित को दान करने जा रहे थे । नचिकेता विवश होकर अनजाने में फिर बोल उठा- 'मेरे तात ! इन सब गौधों को देने के बाद मुझे किसे दीजिएगा ? आपने तो बताया था न, कि इस यज्ञ में अपना सब कुछ दे दिया जाता है।'


उद्दालक सिहर उठे । एक अज्ञात भय एवं पाप की भयावनी मूर्ति-सी उन्हें दिखाई पड़ी । परन्तु वह पाप-पथ से पीछे नहीं लौटे। नचिकेता का समाधान करना भी उन्होंने उचित नहीं समझा । श्रांखों को तरेरकर उन्होंने एक उड़ती सी निगाह नचिकेता पर डाली, जिसका तात्पर्य शायद यह था कि 'यहाँ से चले जानो, व्यर्थ की बकवास मत करो ।' पर नचिकेता वहीं खड़ा रहा। उसने देखा कि पिताजी अब एक ऐसी गाय का दान करने जा रहे हैं, जो उठाने की कोशिश करने पर भी नहीं उठ रही है और उधर दान लेनेवाले पुरोहित का मुख उदास हो गया है । फिर भी पिताजी उस गाय को उसी तरह बैठे ही बैठे दान कर रहे हैं। वह एकदम विह्वल गया। उसने तय कर लिया कि पिता जी को अब ऐसा घोर पाप नहीं करने दूँगा । झटपट गाय के पास खड़े होकर उसने फिर वही बात दुहराई ! 'मेरे तात ! इस सर्वमेध यज्ञ में मुझे किस ब्राह्मण को दान कर रहे हैं ? मैं उसे देखूंगा। मैं भी तो तुम्हारा ही हूँ न ।'


उद्दालक की पाप भावना ने कठोर क्रोध का स्वरूप धारण कर लिया। उनकी साँसें जोर-जोर से चलने लगीं। नथुने फड़कने लगे । दाँतों की ऊपरी पंक्ति ने निचले होंठ को चबा लिया । श्राँखों से दाहक अंगार की ज्वाला-सी निकलने लगी। हाथ में लिए हुए कुश, अक्षत और जल को नीचे फेंकते हुए वह भीषण स्वर में बरस पड़े— 'पापात्मा कुपुत्र ! तुझे मैं यमराज दो दान कर रहा हूँ, जा तू उसे शीघ्र ही देखेगा। विशाल यज्ञमण्डप में एक छोर से दूसरे छोर तक उद्दालक के कठोर स्वर ने भीषग्ण आतंक की लहर-सी फैला दी। जो जहाँ खड़े या बैठे थे, ठगे-से रह गये । धर्म के अवसर पर यह महान् श्रनर्थ । मङ्गल में श्रमङ्गल । सबके देखते- देखते नचिकेता यमराज के घर जाने की तैयारी में लग गया। वह सचमुच धरतो पर गिर पड़ा था और उसके मुख पर एक अपूर्व ज्योति की छटा विराजमान हो रही थी । कहने को तो उद्दालक के मुख से तीर के समान वह कठोर वचन निकल गया, पर उसकी भीषण यथार्थता ने उन्हें विकम्पित कर दिया। एकलौते प्रिय पुत्र की मृत्यु के घर जाने की बात को वह किस प्रकार बर्दाश्त कर सकते थे । चारों श्रोर से लोग दौड़ पड़े और घेर कर नचिकेता के पास खाड़े हो गये ।


सत्याग्रही नचिकेता जब इस लोक से पिता की आज्ञा प्राप्त कर मृत्यु के लोक जाने का निश्चय कर चुका तो उसे वापस कौन ला सकता था ? उद्दालक का सहज वात्सल्य कृत्रिम क्रोध को दूर भगाकर उमड़ पड़ा। पुत्र को स्नेह से अङ्क में उठाते हुए वह गद्गद कण्ठ से बोले – 'बेटा! तू कहाँ जा रहा है ? मेरी बात का ध्यान न कर । मैं आवेश में यह सब कह गया। भला सोच तो सही, कि तेरे बिना मेरा बुढ़ापा कितना कठिन हो जायगा । मेरे प्यारे ! मैं पाप-पंक में फँस गया था, ,मेरी बुद्धि बिगड़ गई थी, तू उसका ख्याल न कर ।'


परन्तु नचिकेता का लोटना आसान काम नहीं था। उसने दोनों हाथों को जोड़कर विनीत स्वर में कहा - ' पूज्य तात ! आप बतलाते थे कि मेरी इक्कीस पीढ़ियों से लेकर आज तक किसी ने अपना वचन कभी भंग नहीं किया है। मैं भी चाहता हूँ कि अपनी वंश-मर्यादा को सुरक्षित रखूं । पिता की (आपकी) आज्ञा का उल्लंघन, वह चाहे जिस दशा में भी हो, में कभी नहीं कर सकता । धाप भी अपना वचन निभाइए और प्रसन्नता के साथ मुझे मृत्यु के घर सकुशल पहुँचने का आशीर्वाद दीजिए ।'


उद्दालक नचिकेता की इस निश्चय भरी विनत वाणी से विचलित हो गये। उसे गले से लगाते हुए क्षीण स्वर में उन्होंने कहा- 'मेरे प्यारे ! मैं उस निर्मम मृत्यु के घर जाने का आशीर्वाद तुझे नहीं दे सकता। जिसके स्मरण मात्र से मेरा हृदय काँप रहा है, उसके पास तू कैसे जायगा ? कुसुम के समान कोमल तेरा शरीर कठोर मृत्यु के पास जाने योग्य नहीं है। बेटा ! मैंने अपराध किया है । भले ही मुझे वचन भंग करने का पाप लगे; पर मैं तुझे वहाँ कदापि नहीं जाने दूँगा ।'


नचिकेता ने आँखें खोलकर देखा तो उद्दालक की आंखों से आँसूत्रों की अविरल धारा बह रही थी। अपने कोमल हाथों से आँसू को पोंछते हुए उसने कहा – ' पूज्य तात ! मैं उस मृत्यु से तनिक भी नहीं डर रहा हूँ, जिसके लिए आप घबरा रहे हैं । आप मेरी चिन्ता छोड़ दीजिए, और अपने पुण्यकर्मा पूर्वजों का स्मरण कीजिए, जिन्होंने प्राण गँवाकर भी अपने वचन रखे हैं। असत्य का व्यवहार स्वार्थी और पापी जन करते हैं । उस असत्य से कोई श्रमर नहीं होता । मेरी बड़ी इच्छा यह है कि मेरे इस कार्य से आपके और मेरे—दो पुरुषों के वचनों को रक्षा हो । मेरी ममता की डोर में बंधकर ही आप इतने विह्वल हो रहे हैं। मेरे न रहने पर आप अपना सर्वस्व त्याग कर सर्वमेघ यज्ञ का महान् पुण्य पाएँगे । पुत्र का यही कर्तव्य है कि वह अपना सर्वस्व गँवाकर भी पिता के वचनों का पालन करें, उसकी इच्छा की पूर्ति करे। मेरे तात ! मैं इस अपूर्व अवसर को सामने पाकर छोड़ नहीं सकता। मुझे रोककर आप यज्ञ की समाप्ति में विलम्ब मत लगाइये । सर्वस्त्र त्याग कर सर्वमेध यज्ञ के इतिहास में अपना अमर यश छोड़ जाइए ।


पुत्र की दृढ़ निश्चय धौर प्रेरणा से भरी बातें सुनकर उद्दालक मॅ कहने की हिम्मत नहीं पड़ी। यज्ञमण्डप में कुमार नचिकेता ने अपने पूज्य पिता के चरणों पर शीस घरकर मृत्युलोक का मार्ग ग्रहण किया। सारी जनमण्डली कुछ आगे चित्र के समान खड़ी देखती रह गयी। वह अपने कर्त्तव्य पथ पर कमर कसकर साहस और प्रसन्नता के साथ आगे चल पड़ा ।


मृत्यु अर्थात् यमराज के घर का मार्ग सचमुच बड़ा भयावना था । नचिकेता ने देखा कि अपने-अपने कर्मों के कारण लोग मृत्यु से किस तरह घबराते हैं । हृदय में छाई हुई पाप की रेखायों से लोगों का मन इतना भयभीत है कि सारे मार्ग में हाहाकार मचा हुआ है । कोई अपने पुत्र के लिए रो रहा है तो किसी को पत्नी के वियोग का दुःख है । परन्तु नचिकेता को तो सचमुच पूर्व प्रानन्द मिल रहा था । प्रसन्नता धौर उत्साह के साथ उसने मार्ग को सारी कठिनाइयों का अन्त कर दिया । पिता की प्राज्ञा के पालन करने में उसे जो शान्ति मिल रही थी, वह भूलोक के मायिक जीवन में कहीं नहीं थी। निर्भीक नचिकेता जिस समय मृत्यु के द्वार पर पहुँचा, उस समय संयोग से यमराज कहीं बाहर गये हुए थे। श्रतः द्वारपालों ने उसे भीतर घुसने की अनुमति नहीं दी । विवश होकर उसे बाहर एक वृक्ष के नीचे सुन्दर चबूतरे पर बैठकर यम की प्रतीक्षा करने को कहा गया । वह वहीं पर चुपचाप बैठकर यम की प्रतीक्षा करने लगा ।


कुछ ऐसा काम पड़ गया था कि यमराज तीन दिनों तक बाहर से अपने घर लौट नहीं सके थे । नचिकेता अविचलित मन से वहीं शान्तिपूर्वक बैठकर उनकी प्रतीक्षा करता रहा । बीच-बीच में वह यह सोचकर पुलकित हो जाता कि अव मेरे पिताजी ने उन धच्छी गौओं को दान में देकर सर्वमेध यज्ञ को पूरा कर लिया होगा। चौथे दिन यमराज अपने पुर को वापस आये । भवन में प्रवेश करते हुए उन्होंने देखा कि एक परम तेजस्वी सुन्दर बालक हाथ जोड़कर सामने खड़ा है, उसमें भय की कोई रेखा नहीं है । यमराज ने मुस्कराकर पूछा- 'कुमार ! तुम कौन हो और यहाँ किस काम के लिए आए हो ?'


नचिकेता के बोलने के पूर्व ही यमराज के दोनों द्वारपालों में से एक ने हाथ जोड़कर कहा - 'महाराज ! यह तेजस्वी बालक तीन दिन हुए तब से यहीं बैठा हुआ है, न इसने कुछ खाया है, न कुछ पिया है ।'


यमराज का कृत्रिम कठोर हृदय भी किशोर नचिकेता की करतूतों को सुनकर करुणा से उमड़ पड़ा। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा – 'बेटा! तुम कौन हो और क्यों यहाँ आए हो ? शीघ्र बतलाओ ! मैं भी बिना तुम्हारा काम किए हुए अन्न- जल नहीं ग्रहण करूंगा।'


नचिकेता यमराज की इस सहज उदारता को देखकर निहाल हो उठा। पिता ने यम के बारे में कितना गलत बतलाया था कि वह बड़े भयानक हैं, पर यह तो कितने दयालु हैं ? सचमुच इनकी बातों को सुनकर मैं अपूर्व सन्तोष पा रहा हूँ । थोड़ी देर तक मृत्यु के तेजस्वी मुख को श्रोर निर्निमेष ताकते हुए नचिकेता विनीत स्वर में बोला—'देव ! मैं मुनिवर उद्दालक का पुत्र हैं, मेरा नाम नचिकेता है । मेरे पज्य पिताजी ने अपने सर्वमेध यज्ञ में मुझे दक्षिणा के रूप में आपको प्रदान किया है। आप मुझे सस्नेह ग्रहण कर उन्हें यज्ञ की सम्पन्नता का श्राशीर्वाद दीजिए। मैं यहाँ इसीलिए आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ ।'


यमराज तेजस्वी ब्राह्मण कुमार नचिकेता की निर्भीकता पर ठगे से खड़े रह गये । उन्होंने मन में सोचा, यज्ञ की दक्षिणा में सुकुमार पुत्र का दान और सो भी मुझको ! धन्य है वह पिता और धन्य है यह पुत्र ! ऐसे दृढ़ निश्चयी ब्राह्मणों के लिए हमारा शतशः प्रणाम है। अपने जीवन में मैंने कभी ऐसे साहसी श्रौर सत्यनिष्ठ बालक को कहीं नहीं देखा है। ऐसे पुत्ररत्न के पैदा करनेवाले पिता सचमुच धन्य हैं। विचारों की बाढ़ में यमराज बहने लगे । इस तरह थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद उन्होंने नचिकेता के शिर पर हाथ फेरते हुए कहा- 'बेटा ! मेरे यहाँ आते हुए तुम डरे नहीं ! तुम्हारे पिता ने भी कुछ नहीं सोचा । धीर से धीर लोग भी यहाँ श्राने में विचलित हो जाते हैं। तुम धन्य हो ।'


नचिकेता ने कहा- 'देव ! मैं इस संसार में केवल पाप से डरता हूँ, आप पाप तो हैं नहीं? मैं तो आपको सारे संसार को शान्ति देनेवाला मानता हूँ । श्रापके समान उपकारी इस जगत् में दूसरा कौन है, जो मनुष्य के दीन होन सन्तप्त जीवन को चिर शान्ति देता हो ।'


कुमार नचिकेता की भोली-भाली बातों को सुनकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए धौर बोले— 'कुमार ! मुझे बहुत दुःख है कि तुम्हारे समान तेजस्वी निर्मल हृदय ब्राह्मण कुमार को मेरे दरवाजे पर तीन दिन तीन रात तक भूखा रहना पड़ा । बिना कुछ प्रोढ़े बिछाए तुम इस चबूतरे पर पड़े रहे। मेरे आतिथ्य धर्म की इस से बड़ी हानि हुई है। मुझे सचमुच इसका बहुत खेद है । अपने इस खेद को कम करने के लिए ही मैं तुझे तीन वरदान देना चाहता हूँ। ब्राह्मणकुमार ! सचमुच तुम्हारे जैसे साहसी बालक समझता ।' के लिए मैं तीनों लोकों में कोई भी वस्तु प्रदेय नहीं


यमराज की बातें सुनकर नचिकेता आनंद के समुद्र में हिलोरें लेने लगा । वह कुछ क्षण के लिए सोचता रहा। फिर हाथ जोड़कर बोला- 'भगवन् ! मैं तो आपही का दास हूँ । यह आपकी महत्ता है, जो मुझे एक अतिथि का सम्मान देकर वरदान देना चाहते हैं। मैंने कोई बड़ा काम भी नहीं किया है, पर उसके बदले मुझे वरदान देकर आप अपनी दयालुता का परिचय दे रहे हैं। लोग संसार में ही श्रापके नाम से भय खाते हैं, प्रापके समान सहज दयालु कौन हैं, जो अपने कर्तव्य पालन करनेवाले को भी वरदान देता है।'


नचिकेता इतना कहकर चुप हो गया। वह सोच रहा था कि मैंने कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिसके बदले में वरदान की याचना की जाय । इसी बीच यमराज फिर बोल पड़े—'कुमार ! तुम संकोच मत करो; बिना तुझे वरदान दिए हुए मैं अन्न-जल तक नहीं ग्रहण कर सकता ।'


नचिकेता विवश हो गया । हाथ जोड़कर विनीत भाव से बोला- 'भगवन् ! मैं अपने पूज्य पिता का इकलौता बेटा था। उनकी सेवा के लिए कोई दूसरा प्राणी मेरे घर पर नहीं है । मेरे यहाँ चले थाने से उन्हें घपार कष्ट हो रहे होंगे, क्योंकि उनका शरीर भी शिथिल हो गया है । अतः मुझे पहला वरदान यही दीजिए कि— 'मेरे पिताजी पूर्ण स्वस्थ और नीरोग हो जायें । मेरे विषय में उनकी चिन्ताएँ मिट जायँ और उनका क्रोध मेरे ऊपर से दूर हो जाय ।'


यमराज ने दोनों हाथों को ऊपर उठाते हुए गम्भीर स्वर में कहा- 'ब्राह्मणकुमार ! तुम्हारी यह अभिलाषा पूरी हो। तुम्हारे पिता संसार की सब प्रकार की चिन्ताओं से मुक्त हो जायें । अब तुम मुझसे अपना दूसरा वरदान मांगो।'


नचिकेता थोड़ी देर तक मौन रहा। फिर हाथ जोड़कर बोला- 'देव ! मैने सुना है कि स्वर्ग में बड़ा सुख मिलता है। न वहाँ आपका (मृत्यु का) भय है, न बुढ़ापे का । भूख और प्यास भी वहां किसी को नहीं सताती। आप उस स्वर्गलोक के प्रमुख अधिकारी हैं । अतः उसे प्राप्त करने की विद्या तो अवश्य ही जानते होंगे। ऐसी कृपा कीजिए कि वह विद्या मुझे भी प्राप्त हो जाय । यह दूसरी अभिलाषा है ।'

मराज को आज प्रथम बार स्वर्गविद्या का सच्चा अधिकारी मिला था। अतः उसे देने में उन्हें प्रति प्रसन्नता हुई । गद्गद कण्ठ से वह बोले-'नचिकेता ! तुम्हें स्वर्गविद्या की प्राप्ति अपने भाप ही होगी। अब तीसरा वरदान माँगों । तुझे वरदान देते समय मुझे सचमुच बड़ी प्रसन्नता हो रही है।'


नचिकेता एक ऐसा ब्राह्मणकुमार था, जिसका पिता जीवन की उपासना में ही छला गया था । श्रतः उसने अपने मन में विचारा कि जीवन-विद्या में कौन ऐसा गूढ़ रहस्य है, जिसके कारण मेरे पूज्य पिताजी के समान ब्रह्मवेत्ता भी ठगे गये । उस रहस्य को तो अवश्य जानना चाहिए। विनीत वाणी में उसने हाथ जोड़ कर कहा - 'देव ! आप जीवन विद्या के अनन्य भावार्य कहे जाते हैं। मैं जीवन विद्या के गूढ़ रहस्य को जानना चाहता हूँ, जिसके कारण मेरे पिताजी जैसे निःस्पृह एवं तपस्वी को भी धोखा हुमा । पतः प्राप कृपा कर मुझे उस जीवन- विद्या का तत्त्व बतलाइए। इसके सिवा अब मुझे किसी अन्य वरदान की आवश्यकता नहीं है।'


नचिकेता की बातों को सुनकर यमराज स्तब्ध रह गये । उन्हें स्वप्न में भी यह ध्यान नहीं था कि दस साल के इस ब्राह्मण किशोर में सांसारिक तत्त्वों की इतनी प्राकुल जिज्ञासा होगी। थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद वह गम्भीर स्वर में जंभाई लेते हुए बोले- 'कुमार ! तुम जिस जीवन-विद्या की चर्चा कर रहे हो, वह तो बड़े-बड़े देवों के लिए भी दुर्लभ है। तुम शायद यह भूल गये कि मैं मृत्यु का देव हूँ, जीवन का नहीं। मेरा नाम ही मृत्यु है, जीवन-विद्या का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम कोई दूसरा वर मांगो। यह वर पाकर भी भला क्या करोगे !'


नचिकेता इस तरह धोखे में पड़नेवाला बालक नहीं था। वह जानता था कि संसार में जीवन से बढ़कर दूसरी चीज़ कौन-सी है ? जो जिन्दगी के सब तत्त्वों को जान लेगा, उसे धन-सम्पत्ति या स्वर्ग के राज से भी कोई मतलब नहीं रहेगा । अनमोल हीरे को छोड़कर मिट्टी का घरौंदा लेना उसे क्यों पसन्द श्राता ? उसने दृढ़ता प्रकट करते हुए कहा- 'भगवन् ! यदि वह जीवन-विद्या देवताओं को भी दुर्लभ है, तब तो मैं सब प्रकार का कष्ट सहन करके भी उसे पाना चाहूँगा । ग्राप जो यह कह रहे हैं कि आप केवल मृत्यु के देव हैं, उसी से तो मुझे मालूम हुआ कि आप जीवन के तत्त्वों को पूर्णतया जानते हैं। क्योंकि जो अन्धकार को जानता है, वही प्रकाश की किरणों को भी पहचानता है। बिना एक के जाने दूसरे का परिचय कैसे हो सकता है ? मैं तो समझता हूँ कि आपके समान इस जीवन विद्या को सिखाने वाला दूसरा श्राचार्य मुझे कहीं अन्यत्र नहीं मिलेगा । देव ! में इसके अतिरिक्त दूसरा कोई भी वर नहीं चाहता।'


यमराज ने एक बार फिर नचिकेता को इस निश्चय से डिगाने का असफल प्रयत्न किया, उसने कहा—'कुमार! तुम्हारे लिए में संसार का समस्त धन- वैभव देने को तैयार हूँ । तुम चाहो तो मैं सैकड़ों वर्ष की लम्बी उमर तुम्हें दे दूँ । पृथ्वी का सारा राज तुम्हारा कर दूँ: ऐसे-ऐसे रथ, घोड़े और हाथी देहूँ, जो इच्छा करते हो जहाँ चाहो, पहुँचा देंगे। दास, दासी, राजभवन, सुन्दरी स्त्री, पुत्र-पौत्रादि जो कुछ भी चाहो, तुम्हारे लिए प्रस्तुत कर दूँ । स्वर्गलोक और मृत्युलोक का सारा भोग-विलास भी मैं तुम्हें दे सकता हूँ, मगर ऐसा वर मुझसे मत माँगो, जिसकी देने की सामर्थ्य मुझमें है ही नहीं ।'


नचिकेता चुपचाप यमराज की चतुरता भरी बातें सुनता रहा । यमराज के इन प्रलोभनों का उसके मन पर कुछ भी असर नहीं पड़ा। हाथ जोड़कर विनम्र स्वर में वह बोला—'मृत्यु के देव ! आपसे यह कहना न पड़ेगा कि यह वस्तुएँ, जिन्हें नापने मुझे देने की चर्चा की है, कितनी नश्वर हैं । एक क्षण के लिए भी इनका कोई ठिकाना नहीं है । भोग-विलास, राज-काज, स्त्री-पुत्र, हाथी-घोड़े यह सब मरने पर किस मनुष्य के साथ-साथ जाते हैं। लम्बी प्रायु भी तो एक न एक दिन खतम हो ही जायगी। मुझे तो ऐसी वस्तु की जरूरत है, जिसके पाने से मरना नहीं पड़ता । मैं तो उस जीवन-विद्या को पाना चाहता हूँ, जिसे जान- कर आप कभी मरते नहीं । हे महाराज ! आपके समान परम शान्ति एवं सन्तोष देनेवाले देवता की शरण में आकर भी कौन ऐसा अभागा होगा, जो इन प्रशान्ति श्रौर श्रसन्तोष पहुँचानेवाली नाशवान वस्तुओं की कामना करेगा ? मुझे दूर मत फेंकिए। अपनी अमोघ कृपा का भाजन बनाकर इस तरह भुलावे में डालने की आशा मैं आपसे नहीं करता । देव! मुझे जीवन-विद्या का शिष्य बनाइए और दूसरी बातें छोड़ दीजिए। मैं आपसे बिना इस विद्या की प्राप्ति किए हुए कहीं अन्यत्र नहीं जा सकता ।'


यम की इस अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण होकर नचिकेता का मुख-मण्डल सुवर्ण के समान दमकने लगा । उसकी दृढ़ निश्चय से भरी बातें सुनकर यमराज और भी प्रसन्न हो गये । उनकी सहज करुणा फिर जाग पड़ी। दोनों भुजाओं से बालक नचिकेता को उठाकर गले लगाते हुए यमराज ने गद्गद स्वर में कहा- मुनिकुमार ! तुम सचमुच धन्य हो । इस संसार में जन्म लेनेवाले मनुष्य मात्र के जीवन में एक बार ऐसा श्रवसर उपस्थित होता है, जब उसके सामने दो रास्ते दिखाई पड़ते हैं। एक होता है श्रेय का अर्थात् सच्चे सुख और वास्तविक कल्याण का तथा दूसरा होता है प्रेय का अर्थात् भोग-विलास से भरा हुआ, दूर से आकर्षक किन्तु आगे चलने पर अशान्ति, दुःख धौर कठिनाइयों से पूर्ण । इनमें पहला उन्नति धर्थात् ऊपर चढ़ने का, मनुष्य से देवता बनने का है तथा दूसरा पतन अर्थात् ऊपर से नीचे गिरने का, मनुष्य से राक्षस बनने का है बेटा ! यह दोनों मार्ग मनुष्य को बड़े धोखे में डालनेवाले होते हैं। जो उन्नति का पहला श्रेय मार्ग मैने बतलाया है, वह देखने में बड़ा कंटकाकीर्ण और पथरीला है। शुरू शुरू में उस पर चलना बहुत कठिन होता है। और इसके विपरीत दूसरा पतन का जो प्रेय मार्ग है, वह शुरू-शुरू में बहुत सरल, मन को गुमराह करनेवाला और सुविधाओं से भरा हुआ दिखता है। मनुष्य इनके पहचानने में धोखे में पड़ ही जाता है । तुम्हरी तरह बिरले हो लोग होते हैं, जो दूसरे को ठुकराकर पहले पर अग्रसर होते हैं । वत्स ! वही मनुष्य सच्चा वीर, विवेकी थोर भाग्यशाली भी हैं, जो तुम्हारी तरह मानव जीवन के तत्वों को ढूंढने में सब कुछ भुला देता है । मेरे बार-बार के प्रलोभन दिखाने पर भी जो तुम अपने निश्चय से नहीं डिगे, वह असाधारण बात है। बड़े-बड़े देवता, ऋषि-मुनि भी उस स्थिति में विचलित हो जाते हैं । वत्स ! तुम धन्य हो । अब मैं तुम्हें जीवनविद्या की शिक्षा श्रवश्य दूंगा, क्योंकि तुम उसके सच्चे अधिकारी हो ।

संसार में बहुत से लोग अपनी प्रतिभा तथा बुद्धि द्वारा इस जीवनविद्या को जानने का प्रयत्न करते हैं और थोड़े अंश में उसकी प्राप्ति भी उन्हें हो जाती है; पर उनके अपने जीवन में यथार्थ रूप में वह श्रोत-प्रोत नहीं होती। स्वार्थ, द्वेष, लोभ श्रादि के कारण उनकी आत्मा से उसका सहज सम्बन्ध स्थापित नहीं होता । फल यह होता है कि कच्चे पारे की तरह शरीर के अंग-प्रत्यंग से वह फूट पड़ती है। ऐसे अनधिकारी, न केवल संसार को ही वरन् अपने थापको भी धोखा देते हैं। जो उस संजीवनी विद्या को सच- मुच पाना चाहते हैं, वह सबसे पहले तुम्हारी तरह उसे धारण करने की योग्यता प्राप्त करें। इसके लिए उन्हें संसार की सत् प्रसत् वस्तुयों की भली-भाँति परीक्षा कर लेनी चाहिए। उन्हें संसारिक भोग-विलास से बिल्कुल अलग हो जाना चाहिए। मुनिकुमार ! थत्र में तुझे उस जीवनविद्या का उपदेश कर रहा हूँ । श्राज तक तुम्हारे समान इस जीवनविद्या का सच्चा अधिकारी मुझे कोई नहीं मिला । तुम सचमुच धन्य हो !'


नचिकेता यम के दोनों चरणों पर अपना शीश रखकर घृष्टता के लिए क्षमा माँगने लगा । उस समय उसका हृदय कृतज्ञता से भर उठा था । 

यम ने जीवनविद्या या ब्रह्मविद्या का यथेष्ट उपदेश देकर अन्त में कहा- 'हे तात! उस जीवनविद्या का मूल तत्व यही है कि जब मनुष्य की सारी इच्छाएँ बीत जाती हैं, जब मन सब प्रकार की मलिन वासनाओं से मुक्त हो जाता है, जब अन्तःकरण में कोई कालिमा को रेखा नहीं रह जाती, तब यह शरीर से मरणशील मनुष्य अमर बनकर उसी जीवन में ब्रह्म की प्राप्ति कर ब्रह्मानन्द में लीन हो जाता है, उसके हृदय की सारी गाँठें खुल जाती हैं और वह कभी नहीं मरता । यही जीवन विद्या का सारांश है, जिसे मैं तुम्हें बता चुका । अब तुम अपने घर को वापस जाओ और अपने पूज्य पिता के प्यासे नेत्रों को तृप्त करो ।'